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कलाम
ऐ शो’ला-ए-जवाला जब से लौ तुझ से लगाए बैठे हैंइक आग लगी है सीने में और सब से छुपाए बैठे हैं
कामिल शत्तारी
कलाम
दिल ने हमारे बैठे-बैठे कैसे-कैसे रोग लगाएतुम ने किसी का नाम लिया और आँखों में अपनी आँसू आए
इब्न-ए-इंशा
कलाम
आरज़ू-ए-वस्ल-ए-जानाँ में सहर होने लगीज़िंदगी मानिंद-ए-शम्अ' मुख़्तसर होने लगी
ग़ुलाम मोईनुद्दीन गिलानी
कलाम
जले आशियाने जो दिल की तरह चमन से शोर-ए-फ़ुग़ाँ उठाये कहाँ लगी ये कहाँ लगी कि क़फ़स से आज धुआँ उठा