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कलाम
हक़ीक़त और ही कुछ है मगर हम क्या समझते हैंजो अपना हो नहीं सकता उसे अपना समझते हैं
पीर नसीरुद्दीन नसीर
कलाम
नहीं हूँ कुछ भी मगर क्या कहूँ कि क्या हूँ मैंफ़ज़ा-ए-क़ुद्स की गूँजी हुई सदा हूँ मैं
मुख़्तार बदायूँनी
कलाम
हुस्न की बारगाह में जब्र का नाम 'इश्क़ हैग़म हो मगर गिला न हो दिल हो मगर ज़बाँ न हो