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हम लोटते हैं वो सो रहे हैंक्या नाज़-ओ-नियाज़ हो रहे हैं
जब से बुलबुल तूने दो तिनके लिएलोटती हैं बिजलियाँ उन के लिए
कुछ ठिकाना है ना-तवानी कान उठा बोझ ज़िंदगानी का
नहीं मुमकिन रसाई ला-मकाँ तकनिशाँ किस तरह पहुँचे बे-निशाँ तक
हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैसेज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे
ये गाली जो ऐ दिलरुबा मिल रही हैदु'आ दी थी उस की सज़ा मिल रही है
दूसरा कौन है जहाँ तू हैकौन जाने तुझे कहाँ तू है
मैं पुराना मस्त हूँ जन्नत मेरा काशाना थाहूर साक़ी चश्मा-ए-कौसर मिरा पैमाना था
एक पोशीदः कमर यार ने क्या रक्खी हैआँख भी शक्ल-ए-दहन हम से चुरा रक्खी है
दामनों का न पता है न गरेबानों काहश्र कहते हैं जिसे शहर है उ'र्यानों का
गोर में तुम ने जो लाशे को उतारा होताऐ बुतो ख़ातिमा बिल-ख़ैर हमारा होता
तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा करसरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर
वस्ल की रात तो राहत से बसर होने दोशाम ही से है ये धमकी कि सहर होने दो
एक दिल हमदम मिरे पहलू से क्या जाता रहासब तड़पने तिलमिलाने का मज़ा जाता रहा
हर कली कहती है खुल कर तिरे दीवाने सेदेख निकली है परी सज के परी-ख़ाने से
आईना तिरे हुस्न का दिल भी है जिगर भीहै एक ही सूरत कि इधर भी है उधर भी
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