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कलाम
न बरतो उन से अपनायत के तुम बरताव ऐ 'मुज़्तर'पराया माल इन बातों से अपना हो नहीं सकता
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
वुफ़ूर-ए-शौक़-ए-मुज़्तर है कि उन को हाय क्या कहिएनबी कहिए मलक कहिए बशर कहिए ख़ुदा कहिए
कशिश फुलवारवी
कलाम
'मुज़्तर' मिरी आँखों पर वो दस्त-ए-अदा रक्खेंफिर मुझ से वो ये पूछें अब क्या नज़र आता है
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
बे-कसी तुर्बत-ए-‘मुज़्तर’ पे ये चिल्लाती हैतेरे सदक़े गए क्यूँ तू ने बुलाया मुझ को
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
'मुज़्तर' को जो रोते हो क्या तुम से मोहब्बत थीउस सोग के मैं सदक़े आँखों में तिरी क्यूँ है
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
जो कि 'मुज़्तर' शेफ़्ता हैं ज़ुल्फ़-ओ-रू-ए-यार क्यावो समझते ही नहीं हैं कुफ़्र क्या इस्लाम क्या
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
मिरे मा'शूक़ तुम हो यार तुम हो दिल-बरा तुम होये सब कुछ हो मगर मैं कह नहीं सकता कि क्या तुम हो
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
पस-ए-दीवार जानाँ दफ़्न करना 'सहव' मुज़्तर कोकि पहलू में दिल-ए-मुज़्तर है कुशा उन की चितवन का
आग़ा मोहम्मद दाऊद
कलाम
उस ने रग रग को सिखा दीं 'इश्क़ में बे-चैनियाँक़ल्ब-ए-मुज़्तर इक ’अज़ाब-ए-जान मुज़्तर हो गया
बेदम शाह वारसी
कलाम
दिल-ए-मुज़्तर के तड़पने से शब-ए-फ़ुर्क़त मेंइक क़ियामत मिरे घर रोज़ बपा होती है