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कलाम
मिरे हल्क़ा-ए-सुख़न में अभी ज़ेर-ए-तर्बियत हैंवो गदा कि जानते हैं रह-ओ-रस्म-ए-कज-कुलाही
अल्लामा इक़बाल
कलाम
यार ख़ुद जल्वा-नुमा था मुझे मा'लूम न थाग़ुंचा-ओ-गुल में बसा था मुझे मा'लूम न था
शाह फ़िदा हुसैन फ़य्याज़ी
कलाम
ये हमीं थे जिन के लिबास पर सर-ए-रह सियाही लिखी गईयही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कलाम
दीद-ए-जमाल-ए-हक़ हुई हुस्न-ए-निगार देख करबन गए बुत-परस्त हम सूरत-ए-यार देख कर