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कलाम
मिरी ज़ीस्त पुर-मसर्रत कभी थी न है न होगीकोई बेहतरी की सूरत कभी थी न है न होगी
पीर नसीरुद्दीन नसीर
कलाम
बहुत ही बे-वफ़ा निकले बहुत ही पुर-जफ़ा निकलेसमझ रखा था हम ने तुम को क्या अफ़्सोस क्या निकले
नादिर देहलवी
कलाम
ऐ दिल-ए-पुर-सुरूर-ए-मन नाज़ न बन नियाज़ बनसाक़ी-ए-मस्त-ए-नाज़ की आँखों में सरफ़राज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
तुझे पसंद है जब से मिरी शिकस्ता-दिलीमुझे भी भाती है उस ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन की शिकस्त
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
पीर नसीरुद्दीन नसीर
कलाम
कभी पुर-ख़ौफ़ जंगों में कभी पुर-अम्न शहरों मेंकभी उड़ते हुए आँचल की बे-तरतीब लहरों में
अहमद नदीम क़ासमी
कलाम
लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ परमैं हूँ वो क़तरा-ए-शबनम कि हो ख़ार-ए-बयाबाँ पर