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कलाम
चश्म में ख़ल्क़ की गो मिस्ल-ए-हबाब आता हूँऐ'न-ए-दरिया हूँ हक़ीक़त में बहा जाता हूँ
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
कलाम
सुबुक-निगाही के दाग़ से तो ये हसरत-ए-दीद ही भली हैहम अपना ख़ुद ए'तिबार खोते किसी के आगे नज़र उठा के
कामिल शत्तारी
कलाम
क़त्ल के अरमान में ख़ून होती हैं दिल की हसरतेंकूचा-ए-क़ातिल को अब हम कर्बला कहने को हैं
ख़्वाजा नासिरुद्दीन चिश्ती
कलाम
वो आँख कि जिस ने परखा था समझा था हमारा राज़-ए-दिलऐ 'राज़' मज़ा तो ये देखो वो राज़ हमारा भूल गई
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
अकबर वारसी मेरठी
कलाम
जो शबाब आया तो क्या कहूँ वो रात के जैसे बदल गएमग़रूर हुए हैं वो इस तरह जज़्बात के जैसे बदल गए
हुनर सिल्लोड़ी
कलाम
ये हमीं थे जिन के लिबास पर सर-ए-रह सियाही लिखी गईयही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कलाम
दर पे उस मुश्किल-कुशा के तुम रहो हाज़िर 'वतन'दोनों 'आलम की जहाँ 'उक़्दा-कुशाई हो गई
वतन हैदराबादी
कलाम
दर पे उस मुश्किल-कुशा के तुम रहो हाज़िर 'वतन'दोनों 'आलम की जहाँ 'उक़्दा-कुशाई हो गई