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कलाम
सूरत में मेरे प्यारे जो कुछ कि है सो तू हैहै दिल में ये हमारे जो कुछ कि है सो तू है
मख़दूम ख़ादिम सफ़ी
कलाम
तिरे जल्वे की बढ़ती है लताफ़त चश्म-ए-गिर्यां मेंकि घुल कर अश्क में छुपता है वो दामान-ए-मिज़्गाँ में
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर
कलाम
जब तसव्वुर में किसी को सामने लाता हूँ मैंउन के जल्वों की फ़रावानी में खो जाता हूँ मैं
अमीर बख़्श साबरी
कलाम
अजब ही हाल है मेरा सनम जाने कि हम जानेंखुला है राज़ बातिन का सनम जाने कि हम जानें
मख़दूम ख़ादिम सफ़ी
कलाम
उस यार ने अपनी शक्ल दिखा आख़िर को काम तमाम कियादिल मुफ़्त में मेरा छीन लिया आख़िर को काम तमाम किया
मख़दूम ख़ादिम सफ़ी
कलाम
फिर बहार आई चमन में ज़ख़्म-ए-दिल आए हुएफिर मिरी दाग़-ए-जुनूँ आतिश की पर काले हुए
इमाम बख़्श नासिख़
कलाम
अगर मंज़ूर है पीना मय-ए-वहदत के साग़र कालिया कर नाम हर दम हज़रत साक़ी-ए-कौसर का