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कलाम
सच है शह-रग से क़रीं अल्लाह मियाँ है रे मियाँतुझ में ये माद्दा समझने का कहाँ है रे मयाँ
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
कलाम
मर जाऊँगा ’इश्क़-ए-शह-ए-ख़ादिम में मैं 'आसिम'मेरे लिए इस दहर में बस नाम यही है
शाह इनायातुलाह सफ़ीपुरी
कलाम
सुंदर शामी छैल-छबीला दोऊ जगत ऊजियारा हैवाँ की दरस बिन कल न पड़त है रेन दिना मोहे तरसत है
मीराँ शाह जालंधरी
कलाम
अफ़्साना मेरे दर्द का उस यार से कह दोफ़ुर्क़त की मुसीबत को दिल-आज़ार से कह दो
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
मेरे मह-जबीं ने ब-सद-अदा जो नक़ाब रुख़ से उठा दियाजो सुना न था कभी होश में वो तमाशा मुझ को दिखा दिया
औघट शाह वारसी
कलाम
दो दिन की तन-आसानी के लिए तक़दीर का शिकवा कौन करेरहना ही नहीं जब दुनिया में दुनिया की तमन्ना कौन करे
शाह महमूदुल हसन
कलाम
मुझ ‘आसिम-ए-बे-दिल से जो पूछेंगे कहूँगाहम तो शह-ए-ख़ादिम के तलब-गार हैं यारो