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कलाम
या दिन की बातें होती हैं या रात की बातें होती हैंये दुनिया है इस दुनिया में हर बात की बातें होती हैं
मुनव्वर बदायूँनी
कलाम
हया बदायूँनी
कलाम
हयात बदायूँनी
कलाम
चश्म-ए-मजनूँ के लिए दीदार-ए-लैला हर जगहवर्ना ग़ैरों के लिए सद पर्दा-ए-महमिल में है
ख़्वाजा हमीदुद्दीन अहमद
कलाम
शेर-ओ-अदब को आज भी सिन्फ़-ए-ग़ज़ल पे नाज़ हैस’ई-ए-मुहाल-ए-सद 'शकील' स’ई-ए-रइगाँ न हो
शकील बदायूँनी
कलाम
फ़स्ल-ए-गुल आई या अजल आई क्यूँ दर-ए-ज़िंदाँ खुलता हैया कोई वहशी और आ पहुँचा या कोई क़ैदी छूट गया