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कलाम
दिल पे ज़ख़्म खाते हैं जान से गुज़रते हैंजुर्म सिर्फ़ इतना है उन को प्यार करते हैं
इक़बाल सफ़ीपुरी
कलाम
ऐ जान ग़म-ए-दुश्मन में शोरीदा-सरी क्यूँ हैहम तो अभी ज़िंदा हैं ये जामा-दरी क्यूँ है
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
मंज़ूर आरफ़ी
कलाम
बेदम शाह वारसी
कलाम
किस घर में किस हिजाब में ऐ जाँ निहाँ हो तुमहम राह देखते हैं तुम्हारी कहाँ हो तुम
शाह अकबर दानापूरी
कलाम
मंज़ूर आरफ़ी
कलाम
ग़ौस क़ुतुब न उरे उरेरे आशिक़ जाण अगेरे हूजेहड़े मंज़िल आशिक़ पहुंचण ग़ौस न पावण फेरे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गएतिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए