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उदासी संत रैदास जी- श्रीयुत परशुराम चतुर्वेदी, एम. ए., एल-एल. बी.

हिंदुस्तानी पत्रिका

उदासी संत रैदास जी- श्रीयुत परशुराम चतुर्वेदी, एम. ए., एल-एल. बी.

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    रोचक तथ्य

    Udasi Sant Raidas ji, Anka-1, 1936

    संत रविदास अथवा रैदास जी कबीर साहब के समकालीन समझे जाते है और कहा जाता है कि इन दोनों महात्माओं का जन्म काशीपुरी में हुआ था तथा, स्वामी रामानंद से उपदेश ग्रहण करने के कारण, ये दोनों आपस में गुरुभाई भी होते थे। परंतु इन वा अन्य ऐसी बातों के सबंध में कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलने जिन के आधार पर इन्हें निर्विवाद रूप से सर्वसम्मत मान लिया जाय। अतएव बहुत से लोगों की यह भी धारणा जान पड़ती है कि रैदास जी, वास्तव में, महाराष्ट्र अथवा राजपूताने के रहने वाले थे। जो हो, इन के प्राप्त पदों की भाषा में भिन्नता होने एवं इन के अनुयायियों के अनेक प्रदेशों में पाए जाने के कारण, यह अनुमान करना अनुचित नहीं जान पड़ता कि, जहाँ कहीं भी इन का जन्म हुआ हो, इन्होंने भिन्न भिन्न स्थानों में पर्यटन अवश्य किया था।

    रैदास जी की उपलब्ध रचनाओं में से सिक्खों के प्रसिद्ध आदिग्रंथ में संगृहीत—

    हरि के नाम कबीर उजागर।

    जनम जनम के काटे कागर।।

    निमत नामदेउ दूधु पीआइआ।

    तउ जग जनम संकट नहीं आइआ।।

    तथा

    नामदेव कबीर तिलोचनु सघना सनु तर।

    कहि रिवदास सुनहु रे सेतहु हरिजीव ते सभै सरै।।

    और,

    जाकै ईदि बकरीदि कुलगऊ रे बंधु करहि

    मानी अहि सेख सहीद पीरा।

    जाकै बाप वैसी करी पूत ऐसी सरी

    तिहू रे लोक परासिध कबीरा।।

    एवं, एक दूसरे संग्रह, रैदास जी की बानी में आए हुए—

    नामदेव कहिए जाति कै ओछ।

    जाको जस गावै लोक।।

    भगनि हेतु भगता के चले।

    अंकमाल ले बीठल मिले।।

    ....................................

    निरगुन का गुन देखो आई।

    देही सहित कबीर सिधाई।।

    पद, 37

    के देखने से प्रकट होता है कि इस महात्मा ने जिस समय इन पदों को बनाया था उस समय तक नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सदना और सेना नामक प्रसिद्ध संतों का देहावसान हो चुका था और वे, कम से कम कुछ पहले से ही, अपनी साधनाओं के फलस्वरूप पूर्ण ख्याति भी प्राप्त कर चुके थे। अतएव, यदि इन पंक्तियों के आधार पर निर्णय किया जावे तो, रैदास जी को हम अधिक से अधिक कबीर साहब का एक अल्पकालिक समकालीन मात्र मान सकते हैं और यदि कबीर साहब का निधनकाल संवत् 1505 अथवा सन् 1448 ई. निश्चित हो तो, उक्त दशा में, हम रैदास जी के प्रारंभिक जीवनकाल को ईस्वी सन् की पंद्रहवी शताब्दी के प्रथम वा द्वितीय चतुर्थांश में रख सकते है।

    रैदास जी के विषय में आज तक ऐतिहासिक चर्चा करने का कष्ट कदाचित् किसी ने नहीं उठाया, अतएव जो कुछ अभी तक ज्ञात है वह अधिकतर ऐसा है जिस में संदेह एवं विवाद का स्थान पद पर हो सकता है। जनश्रुति के अनुसार ये स्वामी रामानंद के प्रसिद्ध 12 शिष्यों में गिने जाते है और यह परंपरा कम से कम ईस्वी सन् 16 वीं शताब्दी अथवा नाभादास, अनंतदास तथा वाजीदास के समय से प्रचलित है। रामानंद स्वामी का समय आजकल 1299 से 1354 तक अथवा 1299 से 1410 तक बतलाया जाता है और इस मत के अनुसार इन का जीवनकाल 14 वीं शताब्दी में ही रखना अथवा अधिक से अधिक उसे 15वीं के प्रथम वा द्वितीय चरण तक बढ़ा ले जाना युक्तिसंगत होगा। संभवतः इसी कारण नागरी-प्रचारिणी सभा काशी के हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों का विवरण प्रथम भाग में रैदास जी को स. 1005 (सन् 1448) के लगभग वर्तमान माना है और सन् 1399 में स्थिर किया है। परंतु इस मत की पुष्टि किसी अन्य प्रमाण से भी सिद्ध होती हुई नहीं दीखती।

    रैदास जी का नाम मीराबाई के कुछ पदों में आता है और, कदाचित् उस के भी पहले, धन्ना जाट ने अपने एक पद में इन की चर्चा नामदेव, कबीर और सेन की ही भाँति की है। इन के विषय में धन्ना ने कहा है कि---

    रविदास ढुवंता ढोरनी तितिनि तिआगी माइआ।

    परगटु होआ साध संगि हरिदरसनु पाइआ।।

    अर्थात् नित्यप्रति ढोरों को ढोकर उन का व्यवसाय करने वाले रैदास ने भी अपनी माया त्याग दी और साधुओं के साथ रह कर भगवान् का दर्शन पाया। इस प्रकट है कि धन्ना द्वारा इस पद की रचना के समय तक रैदास जी अपने धंधे से विमुख हो कर संतों में मिल चुके थे अथवा, यदि इस के पहले के दो चरण और बाद के एक चरण में आए हुए क्रमशः नामदेव, कबीर और सेन के वर्णन पर विचार किया जाय तो, संभवत् मर भी चुके थे। स्वयं रैदास जी ने अपने एक पद में, इसी प्रकार नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सदना और सैन तर चुके हुए बतलाया है जिससे उन के उस रचना के निर्माण-समय तक कबीर का मर चुकना विदित हुआ है। रैदास जी इन दोनों प्रमाणों के आधार पर कबीर के अनंतर और धन्ना के प्रथम जीवित रहने वाले कहे जा सकते है, अथवा यह भी हो सकता है कि वे अधिक से अधिक कबीर से छोटे धन्ना से बड़े समसामयिक रहे हो। इन में से धन्ना का समय विदित नहीं और कबीर का निधन-काल कम से कम स. 1505 अथवा सन् 1448 बतलाया जाता है, अतएव रैदास जी का समय पंद्रहवी शताब्दी के द्वितीय या तृतीय चरण में मानना अनुचित नहीं जान पड़ता।

    इस के सिवाय यह प्रसिद्ध है कि मिर्ज़ापुर आदि कई जिलों में पाया जाने वाला साधों का संप्रदाय रैदास जी की ही परपंरा में चला था और इस की स्थापना पहले-पहल किसी वीरभान नामक व्यक्ति ने सन् 1543 ई. में की थी। वीरभान उदयदास के शिष्य थे और उदयदास की गणना रैदास जी के शिष्यों में की जाती है। यह प्रसिद्धि यदि प्रामाणिक आधारों पर चलाई गई है और वीरभान यदि वास्तव में, रैदास जी को अपना दादागुरु समझते रहे हो तो रैदास जी के समय का इस दृष्टि से भी पंद्रहवी शताब्दी के तृतीय चरण अथवा अधिक से चतुर्थ चरण तक चला जाना असंभव नहीं कह जा सकता। इस से अधिक विचार करने के लिए सामग्री का अभाव है।

    रैदास की बानी में संगृहीत—

    रैदास तू काँवच कली, तुझे छीपे कोइ।

    -दोहा, 5

    करम कठिन सोरि जाति कुजाती।

    -पद, 22

    जाति भी ओछी जनम भी ओछा,

    ओछा करम हमारा।

    -पद, 38 87

    हम अपराधी नीच घर जनमे, कुटुँब लोक करै हाँसी रे।

    -पद, 62

    मोर कुचिल जाति कुचिल में बास।

    -पद, 67

    तथा आदिग्रंथ में मिलने वाली---

    मेरी जाति कमीनी पॉति कमीनी,

    ओछा जनमु हमारा।

    -पद, 6

    पंक्तियों से यह भी विदित होता है कि किसी निम्न श्रेणी की अस्पृश्य जाति में जन्में थे जिस का काम-धंधा बहुत निद्य था और इसी कारण बहुधा लोग उन की हँसी तक उडाया करते थे, और साथ ही रैदास की बानी में प्राप्त---

    कह रैदास खलास चमारा।

    -पद, 31

    ऐसी मेरी जाति विख्यात चमार।

    -पद, 42

    नालीदोज़ हनोज़ बेबख़्त कमीन खिजमतगार तुम्हारा।

    -पद, 60

    चरन सरन रैदास चमइया।

    -पद, 81

    एवं, आदिग्रंथ के---

    प्रेमभगति कै कारने कहु रविदास चमार।।

    -पद, 1

    से यहाँ तक स्पष्ट हूँ कि वे अछूत ही नहीं बल्कि चमार नामक अछूत जाति के वंशज थे और, इस बात को ध्यान में रखते हुए, अपने को वे सदा नीच तथा अधिकारहीन तक समझते थे। इसी प्रकार आदिग्रंथ के ही दो स्थल, अर्थात्----

    मेरी जाति कुटवाँ ढलाढोर ढोवंता,

    नितहि बानारसी आसपासा।

    -पद, 1

    तथा

    जाके कुटंब ढेढ सभ ढोर ढोवत

    फिरहि अजहु बंनारसी आसपासा।

    आचार सहित बिप्र करहि डंडउति

    तिन तनै रविदास दासानदासा।

    -पद, 2

    से यह भी पता चल जाता है कि उन की जाति वाले ढेढ लोग मृतक पशुओं को ढो- ढो कर ले जाते थे और उन का व्यवसाय काशीपुरी के आसपास किया करते थे। परंतु स्वयं रैदास जी, कदाचित्, यह कार्य नहीं करते थे। इन का ध्यान विशेषरूप से भगवान् की और आकृष्ट था और ये एक पहुँचे हुए महात्मा समझे जाने लगे थे, जिस कारण, सदाचारी ब्राह्मण तक इन्हें प्रणाम करने में संकोच नहीं करते थे।

    जान पड़ता है रैदास जी अपने जीवन निर्वाह के लिए पहले जूता सीने आदि का स्ववश-कमागत कार्य करते रहे क्योंकि इस विषय की दो चार कथाएँ भी लोकप्रसिद्ध है, परंतु अपने जीवन के अंतिम भाग में अपना पूर्वोक्त व्यवसाय छोड़ कर निरंतर भगवद-भजन में ही लीन रहने लगे और उस श्रेणी तक पहुँचने पर जनसाधारण की दृष्टि में भी वे श्रद्धा से देखे जाने लगे। इन के सच्चे ईश्वरानुराग, वैराग्य, दैन्य, संतोष एवं निस्पृहता के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित है। उदाहरणतः कहा जाता है कि, एक बार इन्हें किसी साधु ने पारस पत्थर ला कर दिया और, इन के औजार से छुला कर उसे सोना बना कर उक्त पत्थर का उपयोग भी इन्हें बतला दिया, किंतु रैदास जी ने उस बहुमूल्य वस्तु को लेने से इंकार कर दिया और साधु के बहुत आग्रह करने पर उसे अपने छप्पर में कही खोस देने के लिए कह दिया। तब से तरह महीने के उपरांत जब साधु फिर लौट कर आया और पत्थर का हाल पूछा तो इन्होंने कहा, देख लीजिए, जहाँ रक्खा था वही गड़ा होगा।

    इन की कुल रचनाएँ अभी तक उपलब्ध नहीं है। पता नहीं इन्होंने किसी स्वतंत्र ग्रंथ की रचना की थी या नहीं, क्योंकि अभी तक इन के जो जो पद्य मिल सके है वे कई संग्रहों में केवल एकत्रित कर लिए गए जान पड़ते है। काशी-नागरी-प्रचारिणी सभा की खोज-संबंधी रिपोर्ट में रैदास की बानी, रैदास के पद एवं रैदास जी की साखी तथा पद का उल्लेख है जो भिन्न भिन्न रचनाओं के संग्रह मात्र ही जान पड़ते है और वही दशा बेलवेडियर प्रेस द्वारा प्रकाशित रैदास जी की बानी तथा सिक्खों के आदि श्री गुरुग्रंथ साहिबजी में भिन्न भिन्न सोलह स्थानों पर पाए जाने वाले पदों की भी है। अभी हाल में प्रकाशित शांतिनिकेतन के विद्वान श्री क्षितिमोहन सेन की बंगला पुस्तक दादू में संतों के बचनों के दो वृहत् संग्रहों का उल्लेख किया है। दोनों में रैदास के पदों के संग्रह मिलते है। इन में से एक संग्रह अजमेर के श्रीयुत चंद्रिकाप्रसाद त्रिपाठी के पास तथा दूसरा जैपूर में श्री शंकरदास के पास बताया जाता है। सुनने में आता है कि हाल में काशी-नागरी-प्रचारिणी सभा के प्रयत्न से इन की रचनाओं का एक ओर अच्छा संग्रह हस्तलिखित रूप में प्राप्त हुआ है। परंतु अभी तक इसे देखने का मुझे सौभाग्य नहीं हुआ। मेरे पास इस समय केवल दो ही ऐसे संग्रह वर्तमान है जिन में से रैदास जी की बानी में कुल मिला कर 6 साखियाँ और 87 पद है और आदि श्री गुरुग्रंथ साहिबजी में केवल 40 पद ही पद दिए गए है। इन दोनों संग्रहों के पद भिन्न भिन्न रागों के अंतर्गत रक्खे गए है। परंतु आदिग्रंथ के सभी 40 पद उक्त बानी वाले संग्रह में नहीं पाए जाते। केवल 23 पदों में ही न्यनाधिक समानता है। पाठभेद बहुत कुछ पाए जाते है।

    (2)

    रैदास जी के पदों में उन के दृढ़ वैराग्य एवं ईश्वरानुराग की भावनाएँ प्रायः सब कहीं लक्षित होती है और इन दोनों की मूल भित्ति उन के आत्मनिरीक्षण तथा सांसारिक विडबनाओं के कटु अनुभव पर खड़ी की गई जान पड़ती है। आडंबर और स्वाभिमान अथवा झूठी बड़ाई से उन्हें बड़ी चिढ है और अपनी दीनता एवं भगवान् के प्रति आत्मीयता के भाव प्रकट करने में वे कभी नहीं चूकते। वे कहते है कि बड़ाई अथवा झूठे अभिमान का रोग संसार में इस प्रकार संक्रामक सा हो गया है कि सद्गुण और सद्भाव वाले व्यक्तियों पर भी अपना प्रभुत्व जमाए बिना नहीं छोड़ता। यहॉ तक कि---

    भगत हुआ तो चढ़ै बढाई जोग करु खग मान

    गुन हूआ तो गुनी जग कह, गुनी आपको आनै।।

    -पद, 4

    अर्थात् भक्तिमार्ग पर अग्रसर होने पर भी अपनी बड़ाई का लोभ नहीं जाता और योग-साधना में लगे होने पर ही संसार में, अपनी योगसिद्धियों की स्वीकृति बिना कराएं काम चलता है। गुणों की प्राप्ति होते ही इस बात की भूख सताने लगती है कि लोग हमें गुणी माने और सदा अपने को गुणीवत् समझने का स्वभाव सा हो जाता है। इसी प्रकार सच्ची भक्ति का मूल आधार, वास्तव में, प्रेम है किंतु संसार में उल्टा ही देखते को मिल रहा है------

    हम जानौ प्रेम प्रेमरस जाने, नौ विधि भगति कराई।

    स्वाँग देखि सब ही जन लटक्यो, फिर यों आन बँधाई।।

    -पद, 5

    अर्थात् मेरे विचार में प्रेम ही सब कुछ है और प्रेमरस का अनुभव होने पर ही नवधा भक्ति की जा सकती है, किंतु लगो स्वॉग को ही मुख वस्तु समझ कर उस के पीछे पड़े हुए है और उसी में सदा फँसे रहा करते है। वास्तव में, इस स्वाँगरचना अथवा दिखाऊपन के अतिरिक्त, एक और भी बात है जो सदा खटका करती है और, जिस के कारण, उन का मन सदा बेचैन सा रहा करता है। वे कहते है-----

    भगति चितऊँ तो मोह दुख व्यापही,

    मोह चितऊँ तो मेरी भगति जाई।

    उभय संदेह मोहि रैन दिन व्यापही,

    दीनदाता करूँ कवन उपाई।।

    -पद, 75

    अर्थात् भक्ति की प्राप्ति के लिए जब प्रयत्न करने लगता हूँ तो बाधा स्वरूप सांसारिक मोह प्रबल हो उठता है, और यदि मोह में रहने की और ध्यान जाता है तो भक्ति की साधना से ही हाथ धोना पड़ता है। दोनों के बीच एक प्रकार का संदेह जागृत होते रहते दिन रात बेचैनी सताती है, और किंकर्तव्यविमूढ़ की दशा में, सिवाय परमेश्वर की शरण जाने के, और कोई भी उपाय नहीं सूझता।

    इसी लिए, अनेक प्रकार के संदेह एवं भ्रम के चक्करों में सदा पड़े रहने के ही कारण, रैदास जी अपने को बहुत दुखी समझा करते है, और एक हतोत्साह मनुष्य की भाति अपने को बार बार उदास रहने वाला अथवा उदासी भी कहा करते है। अपने लिए उदास अथवा उदासी शब्द का व्यवहार उन्होंने अपनी रचनाओं में अनेक स्थलों में किया है, जैसे-----

    अनिक जतन निग्रह कीए,

    टारी टरै भ्रमफांस।

    प्रेम भगति नहीं ऊपजै,

    ताते रविदास उदास।।

    तथा, कह रैदास उदास भयो मन,

    भाजि कहॉ अब जैये।

    इत उत तुम गोविंद गोसाई,

    तुमही माहि समैये।।

    और, छुटै तबहि जब मिलै एक ही, भन रैदास उदासी।।

    -पद, 11

    अर्थात् अनेक प्रयत्न करने पर भी जब भ्रम का बंधन नहीं टूटता और प्रेमभक्ति उत्पन्न हो पाती है तो हताश हो कर उदास होना ही पड़ता है और पता नहीं चलता कि कहाँ भाग निकले। फिर चारो ओर उस एकमात्र सर्वव्यापक परमेश्वर को ही पाकर जी में जी आता है कि किसी प्रकार उसी के भीतर प्रवेश कर जाएँ, क्योंकि यह दृढ़ निश्चय है कि यह दुख, बिना उस के साथ एकीकरण किए, किसी प्रकार छूट नही सकता। यहाँ पर उपरोक्त विचारों का चिंतन करते समय रैदास जी सदा उदास ही दीख पड़ते है और अपना निश्चयात्मक उद्गार भी वे उदासी बन कर ही प्रकट करते है।

    रैदास जी के ईश्वर-प्रेम एवं विनय-संबंधी अनेक पद बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट है। वे भगवान् के साथ अपनी आत्मीयता दर्शाते समय अपने भावों के सौंदर्य एवं कथन-शैली के अनोखेपन-इन दोनो में-अद्वितीय से दीख पड़ते है। उदाहरण के लिए एक पद में वे इस प्रकार कहते है-----

    जउ हम बॉधे मोहफास हम प्रेमबंधनि तुम बांधे।

    अपने छूटन को जतनु करहु हम छुटे तुम आराधे।।

    माधवे जानत हहु जैसी तैसी, अब कहा करहुगे ऐसी।।

    मीनु पकरि फॉकिउ अरु काटिउ रॉधि कीउ बहुबानी।

    खड खड करि भोजनु कीनो तऊ बिसरउ पानी।।

    अर्थात् हे भगवान् यद्यपि मैं मोह-बंधन द्वारा जकड़ा गया हूँ, तौ भी मैं ने तुम्हे भी अपने प्रेम बंधन बाँध रक्खा है। मैं तो तुम से विनय-प्रार्थनादि कर के छूट भी जा सकता हूँ, किंतु तुम्हारे लिए मेरे पाश से मुक्त होना महा कठिन है। तुम्हें इस बात का सब रहस्य ज्ञात है इस लिए तुम्हारी विवशता को भी मैं भली भाँति पहचानता हूँ। तुम जानते हो कि जल में सदा रहने वाली एवं जल को ही अपना सब कुछ समझने वाली मछली को पकड़ कर यदि कोई बाहर लावे और उसे चीर-काट कर अनेक प्रकार के भोजन बनावे तथा उन टुकड़ों को उदरस्थ भी कर ले तौ भी वास्तव में मीन जल का ही मीन ठहरा। उस के लिए अपने जीवनाधार जल का भूल जाना नितांत असंभव है। और ठीक यही दशा मेरे और तुम्हारे संबंध में भी है।

    इस प्रकार एक दूसरा पद भी देखिए---

    जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा।

    जउ तुम चंद हम भये है चकोरा।

    माधवे तुम तोरहु तउ हम नहिं तोरहि।

    तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि।।

    जउ तुम दीवरा तउ हम बाती।

    जउ तुम तीरथ तउ हम जाती।।

    साची प्रीति हम तुम सिउ जोरी।

    तुम सिउ जोरि अवर सँगि तोरी।।

    जह जह जाउ तहॉ तोरी सेवा।

    तुम सो ठाकुरु अउरु देवा।।

    अर्थात् तुम्हारा और अपना संबंध में इस प्र