'इरफ़ाँ की बज़्म में है जल्वा-तराज़ चादर
रोचक तथ्य
چادر در شان حضرت محمودالحسن ابوالعُلائی (شہسرام-بہار)
'इरफ़ाँ की बज़्म में है जल्वा-तराज़ चादर
आईने में है ’अक्स आईना-साज़ चादर
उलझी हुई हैं नज़रें हर तार-ए-मा-सिवा से
सिखला दे पाक-बाज़ी ऐ दिल-नवाज़ चादर
जल्वे हैं तेरे रौशन कौन-ओ-मकाँ में हर-सू
रखती है नूर तेरा ऐ कारसाज़ चादर
आता मज़ार तक हूँ हर साल सर पे ले कर
करती है मुझ को हिद्दत की सरफ़राज़ चादर
आँखों में हो रहा है वो बर्ज़ख़ मंसूर
है अहल-ए-दिल के दिल में जल्वा-तराज़ चादर
अपनी ख़ुदी से पर्दा दर-अस्ल बंदगी है
पढ़ते हैं सर पे रख कर हम तो नमाज़ चादर
आफ़ाक़ जल्वा-गर है अन्फ़ास हैं मंसूर
है दिल-नवाज़ चादर है जाँ-नवाज़ चादर
बिगड़े हुए सँवर कर बनते हैं मर्द-ए-कामिल
है आफ़्ताब तेरी ज़र्रा-नवाज़ चादर
हाँ आओ सर पे रक्खो अपना ही फ़ाएदा है
मेरी 'अक़ीदतों से है बे-नियाज़ चादर
सद-नाज़-ओ-तमानियत से मख़मूर-ए-नाज़ हो कर
चलते हैं सर पर रख कर मस्त-ए-नमाज़ चादर
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