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जब मसनद-ए-फ़क़्र पे बैठ गए शाही की तमन्ना कौन करे

अमजद हैदराबादी

जब मसनद-ए-फ़क़्र पे बैठ गए शाही की तमन्ना कौन करे

अमजद हैदराबादी

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    जब मसनद-ए-फ़क़्र पे बैठ गए शाही की तमन्ना कौन करे

    जब मालिक-ए-कौनैन अपना हो कौनैन की परवाह कौन करे

    मा'बूद अगर मशहूद नहीं फिर ता'अत में कुछ सूद नहीं

    मस्जूद की जब तक दीद हो मौहूम को सज्दा कौन करे

    हर ख़्वाहिश जान की ख़्वाहिश है ख़्वाहिश जो हो आसाइश है

    सुनता नहीं जब अपनी कोई फिर 'अर्ज़-ए-तमन्ना कौन करे

    तुम आओ आओ वा'दे पर हर हाल में राज़ी है 'अमजद'

    तुम जान और दिल के मालिक हो मालिक से तक़ाज़ा कौन करे

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