Sufinama

खिंची है शमशीर-ए-नाज़ क़ातिल चले हैं मुश्ताक़-ए-मर्ग घर से

अहक़र बिहारी

खिंची है शमशीर-ए-नाज़ क़ातिल चले हैं मुश्ताक़-ए-मर्ग घर से

अहक़र बिहारी

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    खिंची है शमशीर-ए-नाज़ क़ातिल चले हैं मुश्ताक़-ए-मर्ग घर से

    कफ़न लपेटे हुए कमर से कोई इधर से कोई उधर से

    वो गुल-ए-बदन जाँ है चमन की ये जानता हूँ मैं पेशतर से

    हँसा तो कलियाँ चटक के निकलीं किया तकल्लुम तो फूल बरसे

    दिखाइए आज रू-ए-ज़ेबा उठाइए दरमियाँ से पर्द:

    कहाँ से अब इंतिज़ार-ए-फ़र्दा यही तो सुनते हैं उम्र-भर से

    जफ़ा-ए-माशूक़ का गिलः क्या सऊबत-ए-दश्त-ए-कर्बला क्या

    क़दम भी हटते हैं आशिक़ों के अगर बरसती है आग बरसे

    दिखाऊँ अश्कों की गर रवानी घटा हो ग़ैरत से पानी-पानी

    अभी खुले हाल-ए-लन-तरानी हटाऊँ दामन जो चश्म-ए-तर से

    बे-क़रारी का ढंग आया अश्क पर ख़ूँ का रंग आया

    चमक के बिजली हज़ार तड़पी गरज के बादल हज़ार बरसे

    इधर से चिलमन हटा के झाँका उधर से पर्द: हटा के देखा

    लगाया ज़ालिम ने तीर हम पर कभी इधर से कभी उधर से

    स्रोत :
    • पुस्तक : बिहार में उर्दू की सुफ़ियानः शाएरी (पृष्ठ 179)
    • रचनाकार : मोहम्मद तय्यब अब्दाली
    • प्रकाशन : इसरार करीमी, इल्लाहाबाद (1988)
    • संस्करण : First

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