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Sufinama

फ़ज़ा बदली हुई थी 'आलम-ए-हस्ती के गुलशन की

क़ातिल अजमेरी

फ़ज़ा बदली हुई थी 'आलम-ए-हस्ती के गुलशन की

क़ातिल अजमेरी

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    फ़ज़ा बदली हुई थी 'आलम-ए-हस्ती के गुलशन की

    मुझे जब होश में लाईं हवाएँ उन के दामन की

    कोई मेरे सिवा समझा रम्ज़ उस चश्म-ए-पुर-फ़न की

    हमेशा कश्मकश चलती रही शैख़-ओ-बरहमन की

    बच्ची जो बिजलियों के बाद ख़ाकिस्तर वो बाक़ी थी

    कोई हैअत थी मेरे नशेमन में नशेमन की

    इलाही कौन वो महव-ए-ख़िराम-ए-नाज़ है जिस से

    फ़ज़ाएँ मस्त होती जा रही हैं आज गुलशन की

    किसी सूरत नहीं खुलता गुलों का राज़ बुलबुल पर

    खुली है आँख नर्गिस की ज़बाँ है बंद सोसन की

    हो शामिल अगर हुस्न-ए-नज़ारा-सोज़ की फ़ितरत

    करेंगी ख़ुद हिफ़ाज़त बिजलियाँ मेरे नशेमन की

    बढ़ी हैं नाख़ुन वहशत की चीरा दसतियाँ इतनी

    गरेबाँ पुर्ज़े पुर्ज़े हो चुका अब ख़ैर दामन की

    मिरी तुर्बत पे यारब कौन ये महशर ख़िराम आया

    कि मिट्टी ख़ुद-बख़ुद उड़ने लगी है मेरे मदफ़न की

    वफ़ाओं में तो 'क़ातिल' नहीं फ़रियाद की वुस'अत

    निकालो अब नई तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ नालों के शेवन की

    स्रोत :
    • पुस्तक : दीवान-ए-क़ातिल (पृष्ठ 298)
    • रचनाकार : शाह क़ातिल

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