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इस बज़्म का नक़्शा ही अनोखा है नया है

आरिफ़ नक़्शबंदी

इस बज़्म का नक़्शा ही अनोखा है नया है

आरिफ़ नक़्शबंदी

MORE BYआरिफ़ नक़्शबंदी

    रोचक तथ्य

    تضمین

    इस बज़्म का नक़्शा ही अनोखा है नया है

    जिब्रील-ए-अमीं बाँधे हुए हाथ खड़ा है

    हूरों की ज़बानों पे यहाँ सल्ले-’अला है

    मुज्रई-ए-ता’ज़ीम हो जितनी हो बजा है

    दरबार-ए-हुसैनी है यहाँ 'अर्श झुका है

    महताब भी क़ुर्बान है वो हुस्न मिला है

    जुर्अत है वो जुर्अत कोई हम-सर हुआ है

    क्या सूरत-ओ-सीरत हो बयाँ साफ़ खुला है

    हम-शक्ल-ए-नबी है पिसर शेर-ए-ख़ुदा है

    वो लाल है जो गोद में ज़हरा के पला है

    लोगों ने ये सरकार का इरशाद सुना है

    ये मुझ से है मैं उस से रहा फ़र्क़ ही क्या है

    ये मर्तबा औरों को मिलेगा मिला है

    दरबार-ए-रिसालत से ये ऐ'लान हुआ है

    कौनैन का मुख़्तार इमाम दूसरा है

    ईमान की कहता हूँ ये ईमान मिरा है

    देखा है सुना है ये हक़ीक़त है बजा है

    मुश्किल में जहाँ याद किया दूर बला है

    क्या नाम हुसैन इब्न-ए-'अली नाम-ए-ख़ुदा है

    हर दौर का दरमाँ है वो हर दुख की दवा है

    अकबर से जवाँ बेटे का वो दाग़ लगा है

    'अब्बास 'अलम-दार कमर तोड़ गया है

    उस पर भी ये अल्लाह री आईन-ए-वफ़ा है

    हर हाल में शाकिर है शिकवा गिला है

    इक सब्र का बंदा है कि राज़ी ब-रज़ा है

    मज़लूम है बेकस है ग़रीब-उल-ग़ुरबा है

    इक पैकर-ए-ता’अत है कि तस्वीर-ए-वफ़ा है

    चुप-चाप ज़माना की हवा देख रहा है

    हर हाल में शाकिर है शिकवा गिला है

    इक सब्र का बंदा है कि राज़ी ब-रज़ा है

    डरता है बहादुर कहीं अफ़्वाज-ए-दुनी से

    आँखें वो लड़ा लेता है नेज़ों की अनी से

    मैदान कोई ले तो ले मैदाँ के धनी से

    बै’अत की तलब और इमाम-ए-मदनी से

    इक बड़ है शराबी की ये हज़्यान हुआ है

    वाक़िफ़ नहीं क्या मर्तबा-ए-पंजतनी से

    आता नहीं क्यूँ बाज़ भला बद-सुख़नी से

    जाते रहे क्या होश भी आ'ज़ा-शिकनी से

    बै’अत की तलब और इमाम-ए-मदनी से

    इक बड़ है शराबी की ये हज़्यान हुआ है

    दम-भर की नुमाइश है ये सब जल्वा-नुमाई

    बाक़ी जो रहेगी तो वही शान-ए-ख़ुदाई

    किस बात पे नख़वत है ये क्या दिल में है आई

    दुनिया के लिए मालिक-ए-'उक़्बा से लड़ाई

    दुनिया की हुकूमत तो ये दो दिन की हवा है

    अंजाम दिखा दें यहीं हर दुश्मन-ए-दीं को

    चकरा दें इशारों ही में उस चर्ख़-ए-बरीं को

    आ'दा पे उलट दें अभी मक़्तल की ज़मीं को

    वो चाहें तो फ़िन्नार करें फ़ौज-ए-ल'ईं को

    वो मालिक-ए-कुल हैं उन्हें दुश्वार ही क्या है

    गुस्ताख़ियाँ ये बादशह-ए-’अर्श-ए-नशीं से

    कम-बख़्त फिरा जाता है क्यूँ क़िब्ला-ए-दीं से

    दोज़ख़ के बना डाले हैं सामान यहीं से

    इतना तो कोई पूछ ले उस शिम्र-ए-ल’ईं से

    ज़ालिम तुझे कुछ पास-ए-नबी ख़ौफ़-ए-ख़ुदा है

    ये नाज़िश-ए-क़ुदरत है ये है हक़ की सदाक़त

    ये फ़ख़्र-ए-इमामत है यही जान-ए-ख़िलाफ़त

    कम होगी क़यामत से कुछ उस की शहादत

    ज़ालिम तुझे मा'लूम है शब्बीर की 'अज़्मत

    ये उस का नवासा है जो महबूब-ए-ख़ुदा है

    ख़ुशनूदी-ए-ख़ालिक़ के तलब-गार हैं मौला

    दीदार की रहमत के ख़रीदार हैं मौला

    हर रस्म-ए-मोहब्बत से ख़बर-दार हैं मौला

    जाँ देने को सौ जान से तय्यार हैं मौला

    हर हाल में राज़ी हैं ये आईन-ए-वफ़ा है

    हाँ ज़ौक़-ए-शहादत की है तौक़ीर निराली

    पेशानी-ए-ताअ'त की है तनवीर निराली

    ता’लीम-ए-रिसालत की है तासीर निराली

    तकमील-ए-शहादत की है तस्वीर निराली

    ख़म है सर-ए-तस्लीम कि मौला की रज़ा है

    डर है कि बपा और ही कोहराम हो जाए

    आग़ाज़ जिसे कहते हैं अंजाम हो जाए

    उस सुब्ह-ए-क़यामत की यहीं शाम हो जाए

    महशर भी कहीं क़त्ल-गह-ए-’आम हो जाए

    ख़ून-ए-शह-ए-मज़लूम है ख़ुद बोल उठा है

    जिस वक़्त असीरों को नज़र आया मदीना

    कुछ कह नहीं सकता जो क़यामत हुई बरपा

    हर बीबी के लब पर थी सदा या-शह-ए-बतहा

    फ़रियाद कि ताराज हुआ गुलशन-ए-ज़हरा

    सादात का ये क़ाफ़िला ग़ुर्बत में लुटा है

    चेहरा भी है मग़्मूम तो आँखें भी हैं पुर-नम

    हर साँस की आवाज़ में है नाला-ए-पैहम

    'आरिफ़ से छुपाओगे कहाँ तक अलम-ओ-ग़म

    सर धुनते हुए बैठे हुए कैसा है ये मातम

    क्यूँ ग़म की चढ़ाई है 'ख़लील' आज ये क्या है

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