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खड़ा है देर से 'आशिक़ कफ़न बाँधे हुए सर से

अज्ञात

खड़ा है देर से 'आशिक़ कफ़न बाँधे हुए सर से

अज्ञात

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    खड़ा है देर से 'आशिक़ कफ़न बाँधे हुए सर से

    तेरे सदक़े तेरे क़ुर्बान मेरे क़ातिल निकल घर से

    किसी ने वस्ल में ये कह के दिल कुमला दिया मेरा

    उठो याँ से परे सर को मेरे फूलों की बिस्तर से

    ये कह दो अब्र-ए-बाराँ से अगर बरसे तो यूँ बरसे

    कि जैसे मेंह बरसता है हमारे दीदा-ए-तर से

    हो इस बुत से याराना जो ज़ालिम दिल का पत्थर है

    पड़ीं पत्थर मुक़द्दर पर लड़ी है आँख पत्थर से

    अगर चाहूँ तो क़ाबू मैं उन्हें क्या कर नहीं सकता

    करूँ तो क्या करूँ लाचार हूँ अपने मुक़द्दर से

    सवाल-ए-बोसा-ए-लब पर बुत-ए-कमसिन ये कहता है

    नहीं मैं आप के क़ाबिल हँसी कीजे बराबर से

    शब-ए-वसलत अज़ाँ सुन कर छुरी सी फिर गई दिल पर

    कि बिस्मिल्लाह की आई सदा अल्लाहु-अकबर से

    पहुँचा कोई दीवार-ए-हक़ीक़त की बुलंदी पर

    मैं क्यूँ कर पार जा सकता हूँ उस हद्द-ए-सिकंदर से

    ख़ुदा को याद करने आज क्यूँ बैठे हो मस्जिद में

    निकाला किस लिए 'ताहिर' बुतों ने तुम को मंदिर से

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