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रुख़-ए-रौशन को जो ज़ुल्फ़ों में छुपा रक्खा है

अज्ञात

रुख़-ए-रौशन को जो ज़ुल्फ़ों में छुपा रक्खा है

अज्ञात

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    रुख़-ए-रौशन को जो ज़ुल्फ़ों में छुपा रक्खा है

    बज़्म-ए-'उश्शाक़ में अंधेर मचा रक्खा है

    रोज़-मर्रा के जफ़ा-ओ-जौर को वो भूले कैसे

    ग़ैर के कहने से तुम हो गए बद-ज़न मुझ से

    याद को मेरी तुम्हीं ने तो भुला रक्खा है

    एक वो भी किया तुम ने जफ़ाओं से गुरेज़

    तुम को रोज़ाना वफ़ाओं से रहा है परहेज़

    वफ़ा का नाम तो तुम ने ही जफ़ा रखा है

    बात करना तो कुजा चेहरा दिखाना है मुहाल

    एक दिन भी मेरी मजबूरी का आया ख़याल

    वस्ल से तुम ने तो महरूम सदा रखा है

    ग़ैर पे किस तरह ज़ाहिर हुआ ये राज़-ए-निहाँ

    एक तुम सच्चे हो झूटा है ज़माना का बयाँ

    जाने दो छोड़ो भी इस बात में क्या रक्खा है

    पैर में मेहंदी लगी है क्या तुम्हारे बोलो

    क्यूँ उठाते नहीं चिलमन को ज़रा लब खोलो

    चाहने वालों से क्यूँ मुँह को छुपा रक्खा है

    जब कि बेचैन क्या हम को दिल पर ग़म ने

    दिल की तस्कीन की ख़ातिर से सितम-गर हम ने

    तेरी तस्वीर को सीने से लगा रक्खा है

    बज़्म-ए-अग़्यार में बे-शर्मी के ही पर्दे उठे

    ये भी क्या ज़ुलम है अफ़्सोस मिरे होते हुए

    उस ने अग़्यार को पहलू में बिठा रक्खा है

    स्रोत :
    • पुस्तक : Uthte Uthte wo Naqaab-e-Rukh Utha kar Chal Diye (पृष्ठ 19)

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