ज़बाँ पर जो ना'त-ए-शह-ए-दो-जहाँ है
ज़बाँ पर जो ना'त-ए-शह-ए-दो-जहाँ है
ज़मीं रक़्स में वज्द में आसमाँ है
फ़ज़ा झूमती है ये किस का बयाँ है
ज़हे ’इज़्ज़त-ओ-एहतिराम-ए-मोहम्मद
ज़माना में जब तक न वो नूर आया
ख़ुदा के सिवा सब 'अदम ही 'अदम था
न आते अगर वो अंधेरा ही रहता
जमाल-ए-दो-’आलम है नाम-ए-मोहम्मद
ये मंज़िल है कैसी कहाँ का सफ़र है
मक़ाम-ए-दना तक ये किस का गुज़र है
बशर की हदों तक ही जिस की नज़र है
न समझा न समझे मक़ाम-ए-मोहम्मद
वही जानता है हक़ीक़त ख़ुदा की
है दिल में उसी के मोहब्बत ख़ुदा की
उसी पर बरसती है रहमत ख़ुदा की
वज़ीफ़ा बना ले जो नाम-ए-मोहम्मद
मुक़द्दर है उस का जो देखे मदीना
है मरना उसी का है जीना उसी का
सुधरती है 'उक़्बा सँवरती है दुनिया
करे दिल से जो एहतिराम-ए-मोहम्मद
जो फ़रमाया मुँह से हुआ बे-गुमाँ है
कहाँ उस सा दुनिया में मो'जिज़-बयाँ है
ज़बान-ए-मोहम्मद ख़ुदा की ज़बाँ है
कलाम-ए-ख़ुदा है कलाम-ए-मोहम्मद
है 'इश्क़-ए-मोहम्मद शराबन-तहूरा
मुनव्वर हों आँखें तो दिल हो मुजल्ला
ज़माना में मय-कश वो बहका न भटका
मिला जिस को क़िस्मत से जाम-ए-मोहम्मद
तसव्वुर में बस जा तख़य्युल पे छा जा
मिरे दिल से नक़्श-ए-दो-’आलम मिटा जा
मिला जा मिला ख़ुदा से मिला जा जा
फ़िदा तुझ पे ’इश्क़-ए-दवाम-ए-मोहम्मद
मोहब्बत की मंज़िल जहाँ को दिखा दे
जबीन-ए-’अक़ीदत झुका दे झुका दे
मदीने की राहों में आँखें बिछा दे
वो आया वो आया मक़ाम-ए-मोहम्मद
वो ज़ीनत दह-ए-’अर्श-ओ-लौह-ओ-क़लम है
वो शाह-ए-रुसुल है इमाम-ए-उमम है
फ़लक उस की मंज़िल का पहला क़दम है
बयाँ क्या हो 'आ'रिफ़' मक़ाम-ए-मोहम्मद
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