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Sufinama

बन गई बात उन का करम हो गया शाख़-ए-नख़्ल-ए-तमन्ना हरी हो गई

अ'ब्दुल सत्तार नियाज़ी

बन गई बात उन का करम हो गया शाख़-ए-नख़्ल-ए-तमन्ना हरी हो गई

अ'ब्दुल सत्तार नियाज़ी

बन गई बात उन का करम हो गया शाख़-ए-नख़्ल-ए-तमन्ना हरी हो गई

मेरे लब पर मदीने का नाम गया बैठे-बैठे मिरी हाज़िरी हो गई

मुझ पर रहमत हुई मेरे रब की बड़ी मेहरबाँ हो गया कमली वाला नबी

पढ़ के सोया दुरूद उन पे मैं जिस घड़ी फिर ज़ियारत मुझे पे की हो गई

कितना बे-कैफ़ था मय-कदे का समाँ दिल का पैमाना था किर्चियाँ किर्चियाँ

जिस घड़ी गए साक़ी-ए-दो-जहाँ महफ़िल-ए-मय-कशाँ मध-भरी हो गई

फ़र्श पर भी हुआ ज़िक्र-ए-सल्ले-'अला ‘अर्श पर हुआ चर्चा सरकार का

हर तरफ़ सज गई महफ़िल-ए-मुस्तफ़ा हर तरफ़ या नबी या नबी हो गई

महफ़िल-ए-ना'त में आया-जाया करो अपने सू-ए-मुक़द्दर जगाया करो

महफ़िल-ए-ना'त में के बैठा है जो उस की वल्लाह तबीअत ग़नी हो गई

जब मैं पहुँचा दर-ए-शह-ए-लौलाक पर झुक गया ख़ुद-बख़ुद उन की चौखट पे सर

ग़ैब से आई आवाज़ बे-ख़बर जा तिरी खोई क़िस्मत खरी हो गई

सब्ज़ गुम्बद के बैठा हूँ साए तले जालियों के भी जी भर के बोसे लिए

नक़्श पाए नबी पर हैं सज्दे किए यूँ मो'तबर बंदगी हो गई

झोंके ठंडी हवाओं के आने लगे लोग आँखों पर अपनी बिठाने लगे

मेरी जिस दिन से ताजदार-ए-हरम दोस्तों से तिरे दोस्ती हो गई

मुझ पे कितना 'नियाज़ी' करम हो गया दुनिया कहने लगी पंजतन का गदा

उस घराने का जब से मैं नौकर हुआ सब से अच्छी मिरी नौकरी हो गई

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साबरी ब्रदर्स

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