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गर नूर मोहम्मद का नुमूदार न होता

सय्यद ताजुद्दीन शाकिर

गर नूर मोहम्मद का नुमूदार न होता

सय्यद ताजुद्दीन शाकिर

MORE BYसय्यद ताजुद्दीन शाकिर

    गर नूर मोहम्मद का नुमूदार होता

    हक़्क़ा कि ख़ुदाई का भी इज़हार होता

    पेशानी-ए-आदम में जो नूर उस का होता

    मस्जूद-ए-मलाइक का भी ज़िन्हार होता

    कानों में सदा हक़ की आती कभी हरगिज़

    वो कान-ए-फ़साहत जो गुहर-बार होता

    गर चेहरा-ए-ज़ेबा दिखाता वो जहाँ में

    तौहीद का कसरत में भी इक़रार होता

    गर शजरा-ए-ऐमन से कहता वो अनल्लाहो

    ये तूर कभी मतला'-ए-अनवार होता

    आदम में भी गर्द उस के जो दामन की होती

    इंसान कभी मतला'-ए-इसरार होता

    गर आल-ए-मोहम्मद की विला होती दिल में

    'शाकिर' पे भी लुत्फ़-ए-शह-ए-अबरार होता

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