मुझे जुस्तुजू-ए-नबी है अज़ल से भला मेरा ज़ौक़-ए-नज़र कौन जाने
मुझे जुस्तुजू-ए-नबी है अज़ल से भला मेरा ज़ौक़-ए-नज़र कौन जाने
क़ैसर रत्नागीरवी
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मुझे जुस्तुजू-ए-नबी है अज़ल से भला मेरा ज़ौक़-ए-नज़र कौन जाने
तरसती हैं नज़रें मचलते हैं अरमाँ तड़पता हूँ शाम-ओ-सहर कौन जाने
चला तो हूँ सू-ए-मदीना मैं ऐ दिल मगर हूँ मैं ना-वाक़िफ़-ए-राह-ए-मंज़िल
क़दम उठ रहे हैं खिंचा जा रहा हूँ चला हूँ कहाँ से किधर कौन जाने
यूँ सदमात-ए-फ़ुर्क़त सहे जा रहा हूँ कि मर मर के अब तक जिए जा रहा हूँ
बुलाएँगे कब दर पे किस रोज़ होगी मेरी शाम-ए-ग़म की सहर कौन जाने
बुलाएँगे रौज़ा पे सरकार-ए-'आली न लौटेगा महरूम दर से सवाली
मैं तस्कीन यूँ आज देता हूँ दिल को मगर क्या हो कल की ख़बर कौन जाने
चलूँ सर के बल है ये ’अर्ज़-ए-मदीना दयार-ए-नबी में बढ़ूँ बा-क़रीनः
मिलेगा कहाँ नक़्श-ए-पा-ए-मोहम्मद मिलेगी कहाँ रह-गुज़र कौन जाने
अहद और अहमद में है मीम पर न ता-हश्र हल हू सकेगा ये 'उक़्दा
बशर की समझ ने यहाँ हार मानी ये है राज़ ख़ैबर कौन कौन जाने
तलातुम सा आँखों में रहता है बरपा इन आँखों से बहता है अश्कों का दरिया
सकूँ इन दिनों मेरे क़ल्ब-ओ-जिगर का हुआ क्यूँ है ज़ेर-ओ-ज़बर कौन जाने
कब आएगा या-रब वो दिन वो महीना चलूँगा मैं जिस रोज़ सू-ए-मदीना
तुफ़ैल-ए-नबी होगा मुझ को मुयस्सर मदीना का किस दिन सफ़र कौन जाने
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