या हबीब-ए-रब्ब-ए-अकबरर अल-ग़ियास
रोचक तथ्य
منقبت درشان غوث پاک شیخ عبدالقادر جیلانی (بغداد-عراق)
या हबीब-ए-रब्ब-ए-अकबरर अल-ग़ियास
दो-जहाँ के शाह-ओ-सरवर अल-ग़ियास
कर न अब महरूम बाब-ए-पाक से
आ पड़ा मैं तेरे दर पर अल-ग़ियास
शश जिहत से मुझ को घेरा फ़िक्र ने
हूँ मैं अब हैरान-ओ-शश्दर अल-ग़ियास
मैं हूँ प्यासा शर्बत-ए-दीदार का
मालिक तसनीम-ओ-कौसर अल-ग़ियास
हश्र के दिन हक से बख़्शाना मुझे
अब शफ़ी'-ए-रोज़-ए-महशर अल-ग़ियास
मुझ को अपने हिफ़्ज़ में रख अगर घड़ी
हासिदों का मुझ को है डर अल-ग़ियास
कैसे पहुँचूँ बे-तवस्सुल आप तक
मैं हूँ बे-पर बंदा-परवर अल-ग़ियास
अल-मदद बहर अब्बू बक्र-ओ-’उमर
दर प-ए-’उस्मान-ओ-हैदर अल-ग़ियास
दस्त-गीरी अब तिरी दरकार है
है 'फ़क़ीर'-ए-ख़स्ता मुज़्तर अल-ग़ियास
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