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पुर्सीदन-ए-शेर अज़ सबब-ए-पा वापस कशीदन-ए-ख़रगोश

रूमी

पुर्सीदन-ए-शेर अज़ सबब-ए-पा वापस कशीदन-ए-ख़रगोश

रूमी

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    पुर्सीदन-ए-शेर अज़ सबब-ए-पा वापस कशीदन-ए-ख़रगोश

    शेर का ख़रगोश से रुकने का सबब पूछना और उस का जवाब

    शेर गुफ़्तश तु ज़ अस्बाब-ए-मरज़

    ईं सबब गो ख़ास कि-ईंस्तम ग़रज़

    शेर ने उस से कहा मर्ज़ के असबाब में से

    ख़ास सबब बना कि मेरा मक़सद ये है

    गुफ़्त आँ शेर अंदरीं चे साकिनस्त

    अंदर ईं क़िला' ज़ आफ़ात ऐमनस्त

    ख़रगोश ने कहा वो शेर इस कुँवें में मुक़ीम है

    वह इस क़िला में आफ़तों से महफ़ूज़ है

    क़ा'र चे ब-गुज़ीद हर कि 'आक़िलस्त

    ज़ाँ कि दर ख़ल्वत सफ़ा-हा-ए-दिलस्त

    जो समझदार है उस ने कुँवें (जैसी) गुमराही इख़्तियार कर ली

    इस लिए कि तन्हाई में दिल की सफ़ाईयाँ हैं

    ज़ुल्मत-ए-चे कि ज़ुल्मत-हा-ए-ख़ल्क़

    सर न-बुर्द आँ कस कि गीरद पा-ए-ख़ल्क़

    मख़लूक़ की सियह कारीयों से कुँवें का अंधेरा बेहतर है

    जो शख़्स लोगों के पाँव पकड़े,सर नहीं बचा सकता है

    गुफ़्त पेश ज़ख़्मम रा क़ाहिरस्त

    तू ब-बीं काँ शेर दर चे हाज़िरस्त

    उस ने कहा, आगे मेरा उस पर ज़ख़्म लगाना क़हर ढाने वाला है

    तू देख ले कि वो शेर कुँवें में मौजूद है

    गुफ़्त मन सोज़ीदः-अम ज़ाँ आतिशी

    तू मगर अंदर बर-ए-ख़्वेशम कशी

    उस ने कहा, मै इस आतश मिज़ाज से जला हुआ हूँ

    हाँ, अगर तू मुझे अपनी बग़ल में ले-ले

    ता ब-पुश्त-ए-तू मन कान-ए-करम

    चश्म ब-गुशायम चे दर बंगरम

    ताकि करम की कान तेरी मदद से

    मैं आँख खोलूँ, कुवें में देखूँ

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