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बादशाही से तो बेहतर है मिरी रंज-कशी

करामत अली शहीदी

बादशाही से तो बेहतर है मिरी रंज-कशी

करामत अली शहीदी

MORE BYकरामत अली शहीदी

    रोचक तथ्य

    خمسہ بر غزل عبدالرحمٰن جامیؔ

    बादशाही से तो बेहतर है मिरी रंज-कशी

    शहद-ए-जन्नत से भी शीरीं है मुझे तल्ख़-चशी

    ’अक़्ल-ए-कुल को है तमन्ना मिरे दीवाना-वशी

    ली हबीब-ए-’अरबी मदनी क़ुरशी

    कि बुवद दर्द-ओ-ग़मश ’ऐश-ओ-ख़ुशी

    दैर का हूँ मैं चराग़ और वो है सुब्ह-ए-ख़िराम

    मैं रहूँ हिन्द में उस का है मदीना पे करम

    एक ग़म मुझ को नहीं पाँव में हो लाख वरम

    गरचे सद-मरहलः दूरस्त ज़-पेश-ए-नज़रम

    वज्हतुन बे-नज़री कुल्लु ग़दावतुन-ओ-’अशा

    हक़ से साइल हूँ दो-’आलम के जो हों मोहतशमी

    मुद्द’आ उस की ग़ुलामी में है साबित-क़दमी

    इस से बढ़ चलने में ही अपनी फ़िरासत की कमी

    फ़ह्म-ए-राज़श चे कुनम 'अरबी मन 'अजमी

    लाफ़-ए-मेह्रश चे ज़नम क़ुरशी मन हब्शी

    पाँव धो-धो के मैं पीने लगूँ उस की जिस रात

    ख़ुश्क दम मैं करूँ हाज़िर हों अगर नील-ओ-फ़ुरात

    ख़िज़्र छेड़े तो कहूँ राह ले सू-ए-ज़ुल्मात

    मस्लहत नीस्त मरा सैरे अज़ीं आब-ए-हयात

    ज़ा'अफ़ल्लाहु बिहि कुल्लु ज़बान ’अत्शा

    जब अदम-ख़ाना में हस्ती का खुला रौशन-दाँ

    नूर-ए-अव्वल से हुवैदा हुए अफ़राद जहाँ

    अपने मर्कज़ की तरफ़ होती है हर चीज़ रवाँ

    ज़र्रः दारम ब-हवा-दारी-ए-ऊ रक़्स-कुनाँ

    ता-शुद शोहरः-ए-आफ़ाक़ ब-खुर्शीद वशी

    बरसों मय-ख़ाना-ए-यसरिब में रहे हिन्दी-ओ-फ़रस

    सिर्फ़ को भेजें शुजा’आन-ए-'अरब सारिम-ओ-तरस

    शौक़ में सैकड़ों मिस्कीन मरें बाहम करें 'उर्स

    सिफ़त-ए-बादः-ए-ला’लश ज़-मन-ए-मस्त म-पुर्स

    ज़ौक़-ए-ईं मी-न-शासी ब-ख़ुदा ता न-चशी

    जाए जादः हो शहीदे दम-ए-ख़ंजर हर चंद

    रग-ए-गर्दन से चल रीश-ए-सिफ़त हो ख़ुर्संद

    मौलवी ने तुझे दी नाम से अपने ये पंद

    जामी अरबाब-ए-वफ़ा जुज़ रह-ए-'इश्क़श न-रवंद

    सर मबादत गर अज़ीं राह-ए-क़दम बाज़-कशी

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