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ये है दरबार-ए-शाहाना ये है वो बज़्म-ए-शाहानी

अफ़ज़ल जयपुरी

ये है दरबार-ए-शाहाना ये है वो बज़्म-ए-शाहानी

अफ़ज़ल जयपुरी

MORE BYअफ़ज़ल जयपुरी

    ये है दरबार-ए-शाहाना ये है वो बज़्म-ए-शाहानी

    कि शाहान-ए-जहाँ कर यहाँ करते हैं दरबानी

    अगर हो देखना मद्द-ए-नज़र शान-ए-सुलैमानी

    तो आओ और कर पाओ फ़ैज़-ओ-लुत्फ़-ए-रूहानी

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

    अगर मंज़ूर है दुनिया-ओ-दीं की नेक सामानी

    करो पैदा अगर कुछ हो सके तो दर्द-ए-पिन्हानी

    फिर उस हालत में हाज़िर हो ब-सद आदाब-ए-सुल्तानी

    और कर मुर्शिद-ए-कामिल के दर पर रख दो पेशानी

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

    मरीज़-ए-दर्द-ए-’इस्याँ हो उसी की है परेशानी

    सियाही दिल पे आई दूर हैं अनवार-ए-रूहानी

    दवा कुछ काम की उस के अंग्रेज़ी यूनानी

    अगर है तो यही बस उल्फ़त-ए-शाह-ए-सुलैमानी

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

    रहोगे मुब्तला दुनिया में जब तक है परेशानी

    यही बर्बादियाँ होंगी यही आशुफ़्ता-सामानी

    अगर है आख़िरत में भी तुम्हें कुछ आबरू पानी

    तो बस अब आओ कर लो बै'अत-ए-शाह-ए-सुलैमानी

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

    हिदायत हादियों की कुछ मानी और कुछ जानी

    दिल पर दाग़-ए-’इस्याँ ने बनाया जुर्म का बानी

    रहे बे-फ़िक्र 'उक़्बा से सरासर थी ये नादानी

    चरा कारे कुनद 'आक़िल के बाज़ आयद पशेमानी

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

    अगर सोहबत रही है इब्तिदा से रू-सियाहों की

    अगर कुछ छा गई है दिल पे तारीकी गुनाहों की

    और अब इस्लाह है मद्द-ए-नज़र अपनी निगाहों की

    तो अब तौबा करो सूरत बनाओ दाद-ख़्वाहों की

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

    ये माना हिर्स-ओ-आज़-ओ-तमा’ ने दुनिया से खोया है

    नहीं दुनिया से खोया आख़िरत को भी डुबोया है

    ये कैसा मज़र’आ-ए-'उक़्बा में तुम ने बीज बोया है

    ग़नीमत है कि अब पछता के दिल इस ग़म में रोया है

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

    हमेशा तुम रहे मशग़ूल दुनिया के बखेड़ों में

    फ़ुज़ूल और ग़ैर-ओ-ना-माक़ूल दुनिया के बखेड़ों में

    पड़ी है आबरू पर धूल दुनिया के बखेड़ों में

    अब इतना ही करो मा'मूल दुनिया के बखेड़ों में

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

    अगर तुम को सियह-कारी ने तारीकी में डाला है

    कि जिस से मुँह भी काला और तुम्हारा दिल भी काला है

    तो अब देखो उधर नूर-ए-हिदायत का उजाला है

    यहाँ जाओ ये रस्ता शफ़ा'अत का निकाला है

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

    तकल्लुफ़ बरतरफ़ तरतीब-ए-दा’वत देख कर 'अफ़ज़ल'

    क़दीम अहबाब और उन की मोहब्बत देख कर 'अफ़ज़ल'

    मशाइख़ और उन का फ़ैज़-ए-सोहबत देख कर 'अफ़ज़ल'

    चलो और चल के तुम भी नूर-ए-वहदत देख कर 'अफ़ज़ल'

    शरीक-ए-बज़्म-ए-अक़्दस हो के कर लो क़ल्ब नूरानी

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