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ज़ाहिदा ज़ोहद-ओ-'इबादत से बता क्या होगा

अज्ञात

ज़ाहिदा ज़ोहद-ओ-'इबादत से बता क्या होगा

अज्ञात

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    ज़ाहिदा ज़ोहद-ओ-'इबादत से बता क्या होगा

    हूर-ओ-फ़िरदौस मिलेंगे ये नतीजा होगा

    पर तू इस बात को अब तक समझा होगा

    कब वो जन्नत के लिए महव-ए-तमन्ना होगा

    जिस ने सहरा-ए-मदीना कभी देखा होगा

    वो वल्लाह हसीनान-ए-जहाँ को देखे

    तिरछी नज़रों कभी रू-ए-बुताँ को देखे

    भूले से भी रुख़-ए-माह-वशाँ को देखे

    आँख उठा कर कभी हूर-ए-जिनाँ को देखे

    अहमद-ए-पाक की सूरत का जो शोरा होगा

    सब पे ज़ाहिर है कि हूँ 'आशिक़-ए-सुल्तान-ए-'अरब

    सर में सौदा है यही दिल में यही रंज-ओ-त’अब

    क्यूँ ख़बर उस को अब तक हुई ये क्या है ग़ज़ब

    मेरे आने की जो जन्नत में है रिज़वाँ को तलब

    ’आशिक़-ए-कू-ए-नबी मुझ को समझा होगा

    हिन्द में रहने से मैं सख़्त हुआ हूँ मजबूर

    ज़िंदगी थोड़ी सी और दिल में है हसरत का वुफ़ूर

    इतना इरशाद तो तस्कीं के लिए होवे ज़रूर

    दर पे कब कुश्ता-ए-फुर्क़त को बुलाओगे हुज़ूर

    हाल पर मेरे करम कब शह-ए-वाला होगा

    शोहरत-ए-हुस्न तो हम ने भी सुनी यूसुफ़ की

    पर तस्वीर थी हम-शक्ल बनी यूसुफ़ की

    क्या है तक़्सीर वो शैदा जो हुई यूसुफ़ की

    चारा होती ज़ुलैख़ा को कभी यूसुफ़ की

    जल्वा महबूब-ए-ख़ुदा का नहीं देखा होगा

    फ़ख़्र ए'जाज़ पे करते थे जो अपने 'ईसा

    मर्दा वो और थे कर देते थे जिन को जिंदा

    कुश्ता-ए-हिज्र-ए-नबी कोई था उन को मिला

    जब मैं समझूँगा कि ए'जाज़-ए-मसीहा कुछ था

    कोई बीमार-ए-मोहम्मद अगर अच्छा होगा

    दिल पे तो कसरत-ए-’इस्याँ से हैं शाहा सदमात

    किस कशाकश में पड़ें देखिए हम बा'द-ए-ममात

    कुछ मगर दिल को तसल्ली है सुनी जब से ये बात

    दम हो जाएगी इस उम्मत-ए-'आसी की नजात

    आप का लब जो शफ़ा'अत के लिए वा होगा

    ये तो माना कि ग़म-ए-हिज्र-ए-नबी का है वुफ़ूर

    पर मुक़द्दर के नविश्ते से बशर है मजबूर

    ये समझ कर कि पस अज़ रंज मुयस्सर हो सुरूर

    सब्र मुम्ताज़ रखो दिल में कि इक रोज़ ज़रूर

    जज़्ब-ए-सादिक़ है तो उस रौज़ा पे जाना होगा

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