'उश्शाक़ जो हैं अहमद-ए-मुख़्तार तुम्हारे
'उश्शाक़ जो हैं अहमद-ए-मुख़्तार तुम्हारे
बे-ज़ार हैं जीने से दीदार तुम्हारे
रह कर यही कहते हैं तलबगार तुम्हारे
हम गरचे नहीं क़ाबिल-ए-दरबार तुम्हारे
कहलाते तो हैं बंदा-ए-सरकार तुम्हारे
अपने हम-नफ़सो कोई अगर जाए उधर को
कहना शह-ए-दीं से ख़बर ख़स्ता-जिगर को
दीदार की दौलत तो मिली अहल-ए-नज़र को
अच्छे रहे नज़दीक बुरे जाएँ किधर को
गुल हैं तो तुम्हारे हैं जो हैं ख़ार तुम्हारे
था गरचे मुनव्वर मह-ए-कनआँ' का सितारा
नूर आप का जब दीदा-ए-या'क़ूब से गुज़रा
वो कहने लगे देख के ये सूरत-ए-ज़ेबा
यूसुफ़ पे तो 'आशिक़ थी फ़क़त एक ज़ुलैख़ा
यूसुफ़ से हज़ारों हैं ख़रीदार तुम्हारे
पेशानी पे अब्रू-ए-मोहम्मद की है तहरीर
या मा’र्का-ए-बद्र में समसाम की तनवीर
कहते थे शुजा'आन-ए-'अरब देख वो तस्वीर
मक़्तल में जो आओ तो न लो हाथ में शमशीर
बस करते हैं दो-बरु-ए-ख़मदार तुम्हारे
क़ुम कहने की तकलीफ़ उठाते थे मसीहा
तब पीरों में कर पाते थे इक मुर्दा को ज़िंदा
तुम चश्म-ए-ज़दन में ये दिखाते हो तमाशा
मुर्दा को तो ज़िंदा करो और ज़िंदा को मुर्दा
दो वस्फ़ हैं इन आँखों से इज़हार तुम्हारे
गो सब से निराली है हर इक आन तुम्हारी
फिर आँखों में ख़ालिक़ ने भरी कोट के शोख़ी
हर इक को यही कहते सुना जिस पे नज़र की
इक मैं ही नहीं तीर-ए-निगह का तिरी ज़ख़्मी
बहुतेरे हैं इन आँखों के बीमार तुम्हारे
अब बहर-ए-ख़ुदा छोड़ दे ऐ पीर-ए-फ़लक जौर
'मुमताज़' को पहुँचा दे मदीना में तु फ़िल-फ़ौर
जुज़ इस के ये हज़रत से करूँ 'अर्ज़ मैं कुछ और
ख़ामोश नहीं क़ाबिल-ए-महफ़िल जो किसी तौर
कूचा में वो बैठे पस-ए-दीवार तुम्हारे
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