दर दिल-ए-मुस्लिम मक़ाम-ए-मुस्तफ़ा अस्त
दर दिल-ए-मुस्लिम मक़ाम-ए-मुस्तफ़ा अस्त
आबरू-ए-मा ज़-नाम-ए-मुस्तफ़ा अस्त
मुसलमान के दिल में मुस्तफ़ा का मक़ाम है, हमारी इज़्ज़त और आबरू मुस्तफ़ा के नाम से है।
हर कि 'इश्क़-ए-मुस्तफ़ा सामान-ए-ऊस्त
बहर-ओ-बर दर गोश:-ए-दामान-ए-ऊस्त
जिस किसी ने मुस्तफ़ा के इश्क़ को अपनी ज़िंदगी की पूँजी बना लिया तो ख़ुश्की और तरी (ज़मीन और पानी, यानी तमाम कायनात) उसके आँचल के कोने में सिमट आती है (भावार्थ: इश्क़-ए-रसूल की बदौलत उसको दुनिया में बड़ा रुतबा और इख़्तियार मिलता है, या उसके रूहानी मक़ामात बहुत ऊँचे हो जाते हैं)।
तूर-ए-मौजे अज़ ग़ुबार-ए-ख़ानः अश
का'बः रा बैत-उल-हरम काशानः अश
तूर की तजल्ली (पहाड़ पर अल्लाह का नूर) तो उनके घर यानी नबुव्वत के मक़ाम की एक हल्की सी धूल मात्र है; बैतुल-हरम जिसमें काबा है, वह तो उनका एक आलीशान महल है (यानी: उन पर जो खु़दाई नूर हमेशा बरसता है, कोह-ए-तूर पर उसका बस एक छोटा सा नमूना दिखाया गया था)।
ख़ाक-ए-यसरिब अज़ दो-'आलम ख़ुश-तर अस्त
ऐ ख़ुनुक शहरे कि आँजा दिलबर असत
यस्रिब (मदीना मुनव्वरा) की मिट्टी दोनों जहानों से बेहतर है, इसलिए ऐ दोस्त, क्योंकि वहाँ दिलबर (अल्लाह के प्यारे पैगंबर) आराम फ़रमा हैं।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 335)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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