ब-सरत कि जुज़ सर-ए-ज़ुल्फ़-ए-तू ब-सरम सर-ए-दिगरे न-शुद
ब-सरत कि जुज़ सर-ए-ज़ुल्फ़-ए-तू ब-सरम सर-ए-दिगरे न-शुद
ब-रुख़त कि जुज़ रुख़-ए-तु गहे ब-रुख़-ए-दिगर नज़रे न-शुद
आपके सर की क़सम, मेरे सर में आपकी ज़ुल्फ़ के ख़याल के सिवा कभी किसी और का ख़याल नहीं आया। आपके रौशन चेहरे की क़सम, आपके हुस्न के अलावा किसी और का सौंदर्य मेरी नज़रों में नहीं बसा।
चु सगम कमीं ब-सगान-ए-तू-ओ-अज़ जुम्लः बे-क़द्रम वले
ब-दरत कि जुज़ दर-ए-पाक-ए-तु ब-दर-ए-दिगर गुज़रे न-शुद
मैं आपके कुत्तों में सबसे छोटा और सबसे ज़ियादा तुच्छ हूँ, लेकिन आपके दर की क़सम, मैंने कभी किसी दूसरे दरवाज़े का रुख़ नहीं किया।
हमः शब हमी गुज़रद मरा ब-ख़याल-ए-वस्ल-ए-तु ता-सहर
मन-ओ-आह-ओ-नालः कि यक-शबे ब-विसाल-ए-तू सहरे न-शुद
आपके मिलन के ख़याल में मेरी सारी रात बीत जाती है। मैं होता हूँ और आह-ओ-नाला होता है, अफ़्सोस कि मेरी एक भी रात आपके विसाल में रौशन (सुब्ह वाली) नहीं हुई, यानी मिलन में नहीं गुज़री)।
दिल-ओ-जान-ओ-सब्र-ओ-क़रार-ए-मन ब-यक आमद-ए-तू ज़-दस्त रफ़्त
मुतहय्यरम ब-चुनींं रविश कि ब-'नस्र'-ए-तू ख़बरे न-शुद
मेरा दिल और जान, मेरा सब्र और चैन, आपके एक ही जल्वे में हाथ से निकल गए। हैरत की बात ये है कि ‘नस्र’ को इसकी ख़बर भी न हुई।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 202)
- रचनाकार : शाह हेलाह अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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