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दर ईं सख़्ती न-रफ़्त असलन ज़-जा दिल

मीर तक़ी मीर

दर ईं सख़्ती न-रफ़्त असलन ज़-जा दिल

मीर तक़ी मीर

MORE BYमीर तक़ी मीर

    दर ईं सख़्ती न-रफ़्त असलन ज़-जा दिल

    इलाही पारः-ए-संग अस्त या दिल

    उस सख़्ती में भी दिल (अपनी) जगह से ज़रा भी नहीं हिला,

    ख़ुदा! ये पत्थर का टुकड़ा है या सचमुच दिल?

    ज़-दिल अफ़्सानःए माँदः-स्त बाक़ी

    तु मी-ख़्वाही ज़-मन दिल रा कुजा दिल

    दिल की एक कहानी ही तो बाक़ी रह गई है,

    तू मुझसे दिल माँगता है, मगर अब दिल है कहाँ?

    तरीक़-ए-'आशिक़ी मुश्किल तरीक़ेस्त

    दर ईं रह कार-ए-बिसयारस्त बा-दिल

    आशिक़ी का रास्ता बहुत कठिन रास्ता है,

    इस राह में दिल से बहुत काम लेना पड़ता है।

    ब-यक बे-ताक़ती आरम ब-रहमश

    देहद गर पास-ए-'इश्क़-ए-ऊ मरा दिल

    एक बेहोशी के ज़रिए उसे रह्म करने पर राज़ी कर लूँ,

    अगर दिल मुझे उसके इश्क़ की दुहाई दे सके।

    रसीदी गर ब-दिल दर का'बा 'मीर'

    कि चंदाँ नीस्त राह अज़ का'बः ता-दिल

    अगर दिल तक पहुँच गया, तो ‘मीर’ तू काबा में है,

    क्योंकि काबा और दिल के बीच ज़्यादा फ़ासला नहीं है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : Diwan-e-Meer (Persian) (पृष्ठ 266)
    • रचनाकार : Afzal Ahmad Syed

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