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दर ख़राबात-ए-मुग़ाँ नूर-ए-ख़ुदा मी-बीनम

हाफ़िज़

दर ख़राबात-ए-मुग़ाँ नूर-ए-ख़ुदा मी-बीनम

हाफ़िज़

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    दर ख़राबात-ए-मुग़ाँ नूर-ए-ख़ुदा मी-बीनम

    वीं 'अजब-बीं कि चे नूरी ज़-कुजा मी-बीनम

    आतिश-परस्तों के मय-ख़ाने में मैं ख़ुदा का नूर देखता हूँ,

    इस अजीब बात को देखो, नूर है और मैं कहाँ से देखता हूँ।

    कीस्त दुर्दे-कश-ए-ईं-मय-कद: यारब कि दरश

    क़िब्ल:-ए-हाजत-ओ-मेहराब-ए-दु'आ मी-बीनम

    ख़ुदा! उस मय-ख़ाने की तलछट पीने वाला कौन है,

    कि उसके दरवाज़े को मैं ज़रूरत का क़िब्ला और दुआ की मिहराब देखता हूँ।

    जल्व: बर मन म-फ़रोश मलिकुल-हाज कि तू

    ख़ान: मी-बीनी-ओ-मन ख़ान:-ए-ख़ुदा मी-बीनम

    हाजियों के सरदार! मेरे सामने ख़ुद-नुमाई करो,

    तुम घर को देखते हो, और मैं घर के मालिक को देखता हूँ।

    मंसब-ए-6आशिक़ी-ओ-रिंदी-ओ-शाहिद-बाज़ी

    हम: अज़ तर्बियत-ए-लुत्फ़-ए-शुमा मी-बीनम

    आशिक़ी का दर्जा, रिन्दी और महबूब-परस्ती,

    इन सबको मैं आपकी मेहरबानी की तर्बियत से समझता हूँ।

    सोज़-ए-दिल अश्क-ए-रवाँ आह-ए-सहर नालः-ए-सहर

    ईं हम: अज़ असर-ए-लुत्फ़-ए-शुमा मी-बीनम

    दिल की जलन, बहते आँसू, सहर की आह, रात का रोना,

    मैं इन सबको आपकी कृपा का असर मानता हूँ।

    हर-दम अज़ रू-ए-तू नक़्शे ज़नदम राह-ए-ख़याल

    बा कि गोयम दरीं पर्दः चहा मी-बीनम

    हर पल तेरे चेहरे की एक नई सूरत मेरे ख़याल पर छा जाती है,

    मैं किससे कहूँ कि इस पर्दे में क्या-क्या देखता हूँ।

    कस न-दीदस्त ज़-मुश्क-ए-ख़ुतन-ओ-नाफ़ः-ए-चींं

    आँ चे मन हर सहर अज़ बाद-ए-सबा मी-बीनम

    ख़ुतन की कस्तूरी और चीन के नाफ़ा से किसी ने नहीं देखा,

    जो कुछ मैं हर सुब्ह बाद-ए-सबा से देखता हूँ।

    नीस्त दर दाइरः यक नुक़्तः ख़िलाफ़ अज़ कम-ओ-बेश

    कि मन ईं मसअला बे-चून-ओ-चरा मी-बीनम

    दायरे में एक बिंदु का भी फ़र्क़ नहीं है,

    इस मसले को मैं बिना किसी असमंजस के देखता हूँ।

    दोस्ताँ 'ऐब-ए-नज़र-बाज़ी-ए-'हाफ़िज़' म-कुनेद

    कि मन रा अज़ मुहिब्बान-ए-ख़ुदा मी-बीनम

    दोस्तों! हाफ़िज़ की नज़रबाज़ी पर दोष मत गढ़ो,

    क्यूँकि मैं उसे ख़ुदा के दोस्तों में से देखता हूँ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दीवान-ए-हाफ़िज़ (पृष्ठ 256)
    • रचनाकार : हाफ़िज़ शीराज़ी
    • प्रकाशन : मुंशी नवलकिशोर, लखनऊ

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