Font by Mehr Nastaliq Web

दिल-ए-मन बा-दिल-ए-अहमद त'अल्लुक़ हर ज़माँ दारद

नस्र फुलवारवी

दिल-ए-मन बा-दिल-ए-अहमद त'अल्लुक़ हर ज़माँ दारद

नस्र फुलवारवी

MORE BYनस्र फुलवारवी

    दिल-ए-मन बा-दिल-ए-अहमद त'अल्लुक़ हर ज़माँ दारद

    ज़ुहूर-ए-रिश्तः-ए-नूर-ए-फ़ुयूज़-ए-जाविदाँ दारद

    आँ हज़रत के मुबारक दिल से मेरे दिल का संबंध हमेशा बना रहता है। ये संबंध एक स्थायी फ़ैज़ (दैवी अनुग्रह) के रूप में एक नूरानी रिश्ते के साथ क़इम रहता है। (इस शेर में हज़रत ‘नस्र’ ने अपने सिलसिला-ए-तरीक़त की एक शिक्षा की ओर संकेत किया है।)

    चे ’इश्क़स्त ’इश्क़-ए-अहमद या-रब ईं रा हर ज़माँ अफ़ज़ा

    चे दर्द-अस्त दर्द-ए-अहमद काँ दिल-ए-पाकम निहाँ दारद

    अहमद का इश्क़ कितना सुंदर इश्क़ है! पालनहार, इसमें हमेशा बढ़ोतरी फ़रमा। अहमद का दर्द भी कितना प्यारा और अनोखा दर्द है, जो मेरे पवित्र हृदय में छुपा हुआ रहता है। (अपने दिल को इसी दर्द-ए-इश्क़ की वजह से पवित्र कहा है।)

    ख़याल-ए-ऊ शब-ओ-रोज़म दिल-ओ-जान-ए-मरा काहद

    जमाल-ए-ऊ दर चश्म-ओ-दर निगाह-ए-मा 'अयाँ दारद

    उनका ख़याल रात-दिन मेरे प्राण और हृदय को गलाता रहता है, और उनका सुंदर रूप मेरी निगाहों के सामने सदा उपस्थित रहता है। (इस दूसरे मिस्रे में भी तरीक़त की शिक्षा, अर्थात ज़ियारत-ए-नबवी के एक विशेष आध्यात्मिक तरीक़े की ओर संकेत है।)

    तन-ओ-जानम हमी काहद चे दर्दे दर्द-ए-हिज्र-ए-ऊ

    चिहा दर्द-ए-तमन्नायश कि ‘नस्र-ए-ऊ ब-जाँ दारद

    उनकी जुदाई में मेरा तन और मन दोनों पिघल रहा है। ये कैसा दर्द है।उनके विरह का दर्द! उनकी चाहत का दर्द भी कितना अद्भुत है, जिसे ‘नस्र’ ने अपनी रूह में समा रखा है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 207)
    • रचनाकार : शाह हेलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    बोलिए