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सलामुल्लाह मा-कर्रल-लयाली

हाफ़िज़

सलामुल्लाह मा-कर्रल-लयाली

हाफ़िज़

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    सलामुल्लाह मा-कर्रल-लयाली ली

    'अला मल्किल-मकारिम-वल-म’आली

    अल्लाह की सलामती हो जब तक रातें बार-बार आती रहें, बुज़ुर्गी और बुलंदियों के बादशाह पर।

    'अला वादिल-इराकि व-मन 'अलैहा

    व-दारी बिल-लिवा फ़ौक़र्रिमाली

    पीलू के जंगल पर वहाँ रहने वालों पर, और मेरे उस घर पर जो लवा की रेतीली ज़मीन पर है।

    दु'आ गो-ए-ग़रीबान-ए-जहानम

    व-अद’ऊ बित्तवातुरि वत्तवाली

    मैं दुनिया के मुसाफ़िरों के लिए दुआ करता हूँ, और लगातार एक के बाद एक दुआ करता रहता हूँ।

    मनाल दिल कि दर ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़श

    हमः जमइ'य्यतस्त आशुफ्त: हाली

    दिल! तू आह-ओ-ज़ारी कर क्योंकि उसकी ज़ुल्फ़ों की ज़ंजीर में बेचैनी, भी पूरा इतमीनान है।

    अमूतु-साबिरंय्या-लैता-शा’री

    मता-नतक़ल-बशीरु 'अनिल-विसाली

    मैं सब्र करते-करते मरा जा रहा हूँ, काश मुझे पता चल जाए कि मिलन की ख़ुशख़बरी देने वाला कब बोलेगा?

    फ़-हुब्बुका राहती फ़ी कुल्ले हीनिन

    व-ज़िक्रुक मूनिसी फ़ी-कुल्ले हाली

    हर घड़ी तेरी मोहब्बत ही मेरी राहत है, और हर हाल में तेरा ज़िक्र ही मेरा साथी है।

    सुवैदा-ए-दिल-ए-मन ता-क़यामत

    म-बाद अज़ सोज़-ए-सौदा-ए-तु ख़ाली

    मेरे दिल का काला दाग़ क़यामत तक, ख़ुदा करे तेरे इश्क़ की जलन से कभी ख़ाली हो।

    कुजा याबम विसाल-ए-चूँ तु शाहे

    मन-ए-बदनाम-ए-रिंद-ए-ला-उबाली

    तेरे जैसे बादशाह का मिलन मुझे कब हासिल हो सकता है? मैं तो एक बदनाम और लापरवाह मयख़्वार हूँ।

    ज़-ख़त्तत सद जमाल-ए-दीगर अफ़्ज़ूद

    कि 'उम्रत बाद सद साल-ए-हिलाली

    तेरे चेहरे के सब्ज़ ख़त से तेरा हुस्न सौ गुना और बढ़ गया है, ख़ुदा करे तेरी उम्र सौ क़मरी (चाँद के हिसाब से) साल हो।

    बर आँ नक़्क़ाश-ए-क़ुदरत आफ़रीं बाद

    कि गिर्द-ए-मह कशद ख़त्त-ए-हिलाली

    कुदरत के उस चित्रकार को शाबाशी है, जो चाँद के चारों तरफ़ नए चाँद (हिलाल) जैसी लकीर खींचता है।

    ब-हर मंज़िल की रू आर्द ख़ुदाया

    निगहदारश ब-हिफ़्ज़-ए-ला-यज़ाली

    वह जिस मंज़िल की तरफ़ भी रुख़ करे ख़ुदा, तू हमेशा अपनी हिफ़ाज़त से उसकी हिफ़ाज़त कर।

    तु मी-बायद कि बाशी वर्नः सहल-अस्त

    ज़ियान-ए-मायः-ए-जानी-ओ-माली

    बस तू सलामत रहे वरना जान और माल के सरमाये का नुक़सान तो बहुत आसान चीज़ है।

    ख़ुदा दानद कि 'हाफ़िज़' रा ख़बर चीस्त

    व-'इल्मुल्लाह हस्बी ज़ुल-जलाली

    ख़ुदा ही जानता है कि हाफ़िज़ का मक़सद क्या है? और मेरे माँगने के बजाय अल्लाह का जानना ही मेरे लिए काफ़ी है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 293)
    • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First
    • पुस्तक : दीवान-ए-हाफ़िज़ (पृष्ठ 409)
    • रचनाकार :हाफ़िज़ शीराज़ी
    • प्रकाशन : प्रोग्रेसिव बुक्स, लाहाैर

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