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Sufinama

का'बः दर पा-ए-यार दीदम दोष

जिगर मुरादाबादी

का'बः दर पा-ए-यार दीदम दोष

जिगर मुरादाबादी

रोचक तथ्य

अनुवादः अहमद अली बरक़ी

का'बः दर पा-ए-यार दीदम दोष

ईं चे गुफ़्ती 'जिगर' ख़मोश ख़मोश

यार के पाँव पो कल रात को का’बा देखा

क्या कहा तू ने जिगर फिर से बता क्या देखा

हुस्न-ए-पिन्हाँ जल्वःहास्त ब-जोश

अस्ल ख़ामोश फर्अ'-हा ब-ख़रोश

हुस्न पिन्हाँ है मगर उसके जल्वे पुर-जोश

अस्ल ख़ामोश है पर फर्अ' को गोया देखा

असीर-ए-तई'नात-ए-जहाँ

तू चे दानी कि चीस्त मस्ती-ओ-होश

ला मय-ए-होश-रुबा ताकि करूँ मैं आग़ाज़

जादः-ए-शौक़ में बतलाऊँ कि क्या क्या देखा

बादः पेश आर ता-कुनम आग़ाज़

दास्ताँ-हा-ए-इश्क़ आफ़त-कोश

बे-ख़बर चल के तो यह देख कि मस्ती में है होश

होश में रह के भी बे-होशी का जल्वा देखा

बे-ख़बर रू कि होश दर मस्तीयस्त

होशियार कि बे-ख़ूदीस्त ब-होश

कैफ़-ओ-मस्ती में बयाँ मैं ने की अपनी रूदाद

तूने क्यूँ होश में यह मेरा फ़साना देखा

गुफ़्त: बूदम फ़साना अज़ मस्ती

तू शनीदी चरा ब-आलम-ए-होश

क़ज़िया एक नज़र सू-ए-‘जिगर’ देख ज़रा

तेरा ख़ादिम है तुझे जिसने सरापा देखा

क़ाज़िया यक नज़र ब-सू-ए-जिगर

आँ कि यक ख़ादिम अस्त हल्क़ा-ब-गोश

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