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ऐ बे-वफ़ा जानी कि ऊ बर बुल-वफ़ा 'आशिक़ न-शुद

रूमी

ऐ बे-वफ़ा जानी कि ऊ बर बुल-वफ़ा 'आशिक़ न-शुद

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    बे-वफ़ा जानी कि बर बुल-वफ़ा 'आशिक़ न-शुद

    क़हर-ए-ख़ुदा बाशद कि बर लुत्फ़-ए-ख़ुदा 'आशिक़ न-शुद

    बे-वफ़ा जान, उसे बुल-वफ़ा से मोहब्बत क्यूँ हुई?

    ख़ुदा का ग़ज़ब हो कि ख़ुदा के फ़ज़्ल का ’आशिक़ हुआ

    जानी कुजा बाशद कि बर अस्ल-ए-जाँ मफ़्तूँ न-शुद

    आहन कुजा बाशद कि बर आहन-रुबा 'आशिक़ शुद

    वो जान ही नहीं जो अस्ल जान का शैदाई हुआ

    वो लोहा नहीं है जो मिक़्नातीस की मोहब्बत में गिरफ़्तार हो

    वा-ए-आँ माही कि पैवस्तः बर ख़ुश्की फ़ितद

    वा-ए-आँ मिस्से कि बर कीमिया 'आशिक़ न-शुद

    उस मछली पर अफ़सोस जो मुसलसल ज़मीन पर गिर रही है

    उस ताँबे पर अफ़सोस जिसे कीमिया से प्यार नहीं हुआ

    बद लिक़ा शख़्से कि बा-बादशह लाएक़ शुद

    बू-लहब-वस्फ़ी कि बर मुस्तफ़ा 'आशिक़ शुद

    वो शख़्स कितना बुरा है जो बादशाह की सोहबत के लाइक़ बन सके

    वो बू-लहब सिफ़त है जो मुस्तफ़ा का ’आशिक़ हो

    आयद सिला-ए-हर ज़माँ अज़ आसमाँ बर 'आशिक़ाँ

    बे-ख़बर आँ-कस कि बर ईं सिला 'आशिक़ न-शुद

    ’आशिक़ों के लिए आसमान से हर लम्हा आवाज़ आती है

    उसे बे-ख़बर ही कहा जाएगा जो उस आवाज़ का ’आशिक़ हो

    बे-हुनर मर्दी कि दर बहर-ए-मा ग़र्क़ः न-शुद

    वे बे-नवा-ए-ता कि बर ईं-नवा 'आशिक़ न-शुद

    वो इंसान बे-हुनर है जो हमारे समुंदर में ग़ोता-ज़न हो

    वो यक़ीनन बे-नवा है जो उस नवा का ’आशिक़ हो

    कर्र-ओ-फ़र्र-ए-आँ शहे कू बर गदा 'आशिक़ शवद

    ख़ामोश कुन चूँ हर शहे बर हर गदा 'आशिक़ न-शुद

    उस बादशाह की शान-ओ-शौकत का क्या कहना जो अपने गदा का ’आशिक़ हो

    उसे कहो कि वो अब ख़ामोश रहे क्यूँ कि हर बादशाह हर फ़क़ीर का ’आशिक़ नहीं होता

    'शम्स-ए-दीं' बहर-ए-ख़ुदा तू दर्द-ए-मा रा दवा

    फ़रख़ुंदा जाँ दर वै कि बर हर दवा 'आशिक़ न-शुद

    ’शम्सुद्दीन’ तू ख़ुदा के लिए हमारे दर्द की दवा बन जा

    वो दर्द कितना मुबारक है जो हर दवा का ’आशिक़ हो

    स्रोत :
    • पुस्तक : कुल्लियात-ए-शम्स तबरेज़ी (पृष्ठ 252)

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