बा'इस-ए-तस्कीन-ए-दिल है दास्तान-ए-अहल-ए-बैत
बा'इस-ए-तस्कीन-ए-दिल है दास्तान-ए-अहल-ए-बैत
हर मुसलमाँ का वज़ीफ़ा है बयान-ए-अहल-ए-बैत
अशरफ़-ए-मख़्लूक़ है हर ख़ानदान-ए-अहल-ए-बैत
इस लिए अफ़ज़ल हुई ’आलम में शान-ए-अहल-ए-बैत
अहल-ए-बैत-ए-पाक का मैं भी हूँ इक मिदहत-सरा
मुझ को कहता है ज़माना मद्ह-ख़्वान-ए-अहल-ए-बैत
नौनिहाल-ए-गुलसितान-ए-फ़ातिमा को कब ख़िज़ाँ
हश्र तक फूले फलेगा बोस्तान-ए-अहल-ए-बैत
यादगार-ए-हज़रत-ए-शाह-ए-शहीदाँ है शफ़क़
है फ़लक पर आज तक नूर-ए-फ़िशान-ए-अहल-ए-बैत
आल-ए-अहमद शम्स-ए-दीं के सिलसिला के साथ हूँ
मैं भी हूँ मिन-जुमला-ए-वाबस्तगान-ए-अहल-ए-बैत
उस की बख़्शिश को बहुत काफ़ी है इतना वास्ता
नाम 'हमज़ह' का हुआ है मद्ह-ख़्वान-ए-अहल-ए-बैत
- पुस्तक : तज़्किरा-ए-शो’रा-ए-उत्तर प्रदेश जिल्द पाँचवी (पृष्ठ 142)
- रचनाकार : इरफ़ान अ’ब्बासी
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