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ऐ ज़ाएर-ए-मदीना

असलम लखनवी

ऐ ज़ाएर-ए-मदीना

असलम लखनवी

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    सरदार-ए-अंबिया से मेरा सलाम कहना

    सरताज-ए-औलिया से मेरा सलाम कहना

    अल्लाह के नबी के रौज़े पे जाने वाले

    बा-शौक़-ओ-बा-’अक़ीदत सर को झुकाने वाले

    ख़ुश-क़िस्मती पे अपनी मुस्कुराने वाले

    सोया हुआ मुक़द्दर अपना जगाने वाले

    सरचश्मा-ए-वफ़ा से मेरा सलाम कहना

    महबूब-ए-किब्रिया से मेरा सलाम कहना

    रौज़ा की जालियों का जब हो तुझे नज़ारा

    तेरा दिल-ए-शिकस्ता पा जाए जब सहारा

    जब चमके तेरी क़िस्मत बन के फ़लक का तारा

    मेरी तरफ़ से ऐसे माहौल में ख़ुदा-रा

    सुल्तान-ए-अंबिया से मेरा सलाम कहना

    उस जान-ए-मुद्द’आ से मेरा सलाम कहना

    सरकार को मुख़ातिब जिस वक़्त भी समझना

    उम्मत पे हो रहा है जो ज़ुल्म वो सुनाना

    और बेकसों की हालत बा-चश्म-ए-नम सुनाना

    फिर चूम कर रसूल-ए-अकरम का आस्ताना

    हादी-ओ-रहनुमा से मेरा सलाम कहना

    'आलम के नाख़ुदा से मेरा सलाम कहना

    ये ’अर्ज़ करना दुश्मन-ए-’आलम की हैं फ़ज़ाएँ

    तूफ़ान-ए-ग़म से क्यूँ कर अपने को हम बचाएँ

    अब हम हैं और हम पर अग़्यार की जफ़ाएँ

    ज़ुल्म-ओ-सितम की सर पर छाई हैं अब घटाएँ

    पैग़ंबर-ए-ख़ुदा से मेरा सलाम कहना

    ख़ुर्शीद-ए-पुर-ज़िया से मेरा सलाम कहना

    और ये भी कहना हम में पैदा हो ’अज़्म-ओ-हिम्मत

    माज़ी-ए-गुम-शुदा की मिल जाए हम को दौलत

    पामाल होते देखें दुनिया-ए-कुफ़्र-ओ-बिद’अत

    हर एक लब पे फिर हों नग़्मात-ए-’ऐश-ओ-’इश्रत

    सरदार-ए-अंबिया से मेरा सलाम कहना

    सरताज-ए-औलिया से मेरा सलाम कहना

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