आप जब तशरीफ़ लाए मिट गए ज़ुल्मत के साए
आप जब तशरीफ़ लाए मिट गए ज़ुल्मत के साए
बा-अदब सर को झुकाए क़ुदसियों ने गीत गाए
या नबी सलाम 'अलैका
दश्त-ओ-सहरा सहन-ए-गुलशन आप के जल्वों से रौशन
आप का है ख़ुल्क़-ए-अहसन ख़म दो-'आलम की है गर्दन
या नबी सलाम 'अलैका
ऐ शहंशाह-ए-रिसालत हम पे भी चश्म-ए-'इनायत
दूर हो रंज-ओ-मुसीबत हो निगाह-ए-लुत्फ़-ओ-रहमत
या नबी सलाम 'अलैका
अपने रौज़ा पर बुलाएँ ’आरिज़-ए-अनवर दिखाएँ
बख़्त-ए-ख़फ़्ता को जगाएँ बा-अदब हम गुनगुनाएँ
या नबी सलाम 'अलैका
जाँ-कनी का जब हो 'आलम क़ब्र में उठना हो जिस दम
बज़्म-ए-महशर जब हो क़ाइम लब पे ये नग़्मा हो दाइम
या नबी सलाम 'अलैका
आप दाता हम सवाली अब दिखा दें बाब-ए-’आली
चूम कर रौज़ा की जाली ये कहे 'शबनम' कमाली
या नबी सलाम 'अलैका
- पुस्तक : सह्बा-ए-अ’क़ीदत (पृष्ठ 212)
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