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आप जब तशरीफ़ लाए मिट गए ज़ुल्मत के साए

शबनम कमाली

आप जब तशरीफ़ लाए मिट गए ज़ुल्मत के साए

शबनम कमाली

MORE BYशबनम कमाली

    आप जब तशरीफ़ लाए मिट गए ज़ुल्मत के साए

    बा-अदब सर को झुकाए क़ुदसियों ने गीत गाए

    या नबी सलाम 'अलैका

    दश्त-ओ-सहरा सहन-ए-गुलशन आप के जल्वों से रौशन

    आप का है ख़ुल्क़-ए-अहसन ख़म दो-'आलम की है गर्दन

    या नबी सलाम 'अलैका

    शहंशाह-ए-रिसालत हम पे भी चश्म-ए-'इनायत

    दूर हो रंज-ओ-मुसीबत हो निगाह-ए-लुत्फ़-ओ-रहमत

    या नबी सलाम 'अलैका

    अपने रौज़ा पर बुलाएँ ’आरिज़-ए-अनवर दिखाएँ

    बख़्त-ए-ख़फ़्ता को जगाएँ बा-अदब हम गुनगुनाएँ

    या नबी सलाम 'अलैका

    जाँ-कनी का जब हो 'आलम क़ब्र में उठना हो जिस दम

    बज़्म-ए-महशर जब हो क़ाइम लब पे ये नग़्मा हो दाइम

    या नबी सलाम 'अलैका

    आप दाता हम सवाली अब दिखा दें बाब-ए-’आली

    चूम कर रौज़ा की जाली ये कहे 'शबनम' कमाली

    या नबी सलाम 'अलैका

    स्रोत :
    • पुस्तक : सह्बा-ए-अ’क़ीदत (पृष्ठ 212)

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