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मुल्ला नसरुद्दीन- तीसरी दास्तान

लियोनिद सोलोवयेव

मुल्ला नसरुद्दीन- तीसरी दास्तान

लियोनिद सोलोवयेव

MORE BYलियोनिद सोलोवयेव

    "पाक है वह जो जीता है और मरता नहीं!" - अल्फ़ लैला।

    अमीर ख़ोजा नसरुद्दीन पर भरोसा करने लगे थे और उस पर मेहरबान थे। वह हर मुआ’मले में उन का सबसे नज़दीकी सलाहकार बन गया था। ख़ोजा नसरुद्दीन फ़ैसले करता, अमीर उन पर दस्तख़त करते और वज़ीर बख़्तियार सिर्फ़ उन पर पीतल की मुहर लगाता।

    सड़कों पुलों पर से गुज़रने के टैक्स को ख़त्म करने और बाज़ार लगाने पर टैक्स कम करने का अमीर का हुक्म पढ़ते हुए बख़्तियार तअ’ज्जुब से सोचने लगाः "ऐ रहीम! अल्लाह! वाक़ई हमारी सल्तनत में इन्तिहा हो रही है। जल्द ही ख़ज़ाना ख़ाली हो जाएगा! इस नये आलिम ने- ख़ुदा करे इस के पेट में कीड़े पड़े- एक हफ़्ते में वह सब ख़त्म कर दिया, जो मैं ने दस बरसों में बनाया था!"

    एक दिन उसने अपना यह शुबहा अमीर पर ज़ाहिर करने की हिम्मत की।

    उन्हों ने जवाब दियाः "ऐ नाकारा इंसान! तू जानता क्या है? तू समझता ही क्या है ? इन हुक्मों से, जिन से ख़ज़ाना ख़ाली हो जायगा, हम कम ग़मज़दा नहीं है। लेकिन अगर सितारों का यही हुक्म है, तो हम कर ही क्या सकते हैं? सब्र कर, बख़्तियार! यह थोड़े ही दिनों की बात है। सितारों को नेक होने दे। मौलाना हुसैन! ज़रा इसे समझाओ तो।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन वज़ीर-ए-आज़म को एक तरफ़ ले गया। उसे गद्दे पर बैठाया और तफ़्सील से उसे समझाया कि लुहारों, तांबागरों और छिपिलगरों पर लगे नये टैक्स फ़ौरन ख़त्म होने क्यों ज़रुरी हैं।

    "सितारा अल-अव्वा संबुला (कन्या) के बुर्ज में है और सितारा अल्-बल्द क़ौस के बुर्ज में है, ये दोनों सितारे दल्ब (कुम्भ) के बुर्ज में बैठे सितारे सादबुला के मुख़ालिफ़ है। आप समझ रहे हैं वज़ीर साहब? ये सितारे मुख़ालिफ़ हैं और क़ेरान (योग) में नहीं है!"

    "तो क्या हुआ?" बख़्तियार ने जवाब दिया। "क्या हुआ अगर के मुख़ालिफ़ है? पहले भी तो वे मुख़ालिफ़ थे। लेकिन इस से लगातार टैक्स वसूल करते रहने में कोई रुकावट नहीं पड़ी।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहाः "लेकिन आप सौर (वृष) की रास में बैठे सितारे अल-दबारां को भूल रहे हैं! वज़ीर! ज़रा आसमान की तरफ़ नज़र उठाओ। तुम्हें यह ख़ुद दिखायी दे जायगा।"

    वज़ीर ज़िद में बोलता रहाः "मैं आसमान को क्यों देखूं? मेरा फ़र्ज़ तो ख़ज़ाने को देखना है! उस में इज़ाफ़ा करना और उस की हिफ़ाज़त करना है। और मैं देख रहा हूं कि जब से तुम महल में आये हो, ख़ज़ाने की आमदनी कम हो गयी है। टैक्सों की वसूली भी कम हो गयी है। शहरी कारीगरों से टैक्स वसूल करने का यही वक़्त है। मुझे बताओ कि हम टैक्स क्यों वसूल करें?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लायाः "क्यों...? अरे पिछले एक घंटे से मैं तुम्हें बता क्या रहा हूं? क्या अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आता कि हर रास के लिए चांद के दो अंदाज़ होते है और एक तिहाई.."

    "लेकिन मुझे तो टैक्स वसूल करना है।" वज़ीर ने टोका। "टैक्स! क्या तुम समझ नहीं पा रहे हो मौलाना साहब?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहाः "सब्र से काम लो भाई, सब्र से। मैं ने अभी तुम्हें सितारे अस्-सुरैया और आठ सितारों अन्-नाएम..."

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने इतनी पेचीदा और लम्बी बात शुरू कर दी कि वज़ीर के कान बजने लगे और नज़र धुंधली पड़ने लगी। वह उठा और लड़खड़ाता हुआ बाहर निकल गया। ख़ोजा नसरुद्दीन अमीर की तरफ़ मुख़ातिब हुआ और बोलाः "ऐ मेरे आक़ा! उम्र ने भले ही उस के सर पर चांदी बिखेर दी हो, लेकिन यह सजावट सिर्फ़ बाहरी है, उसके सर के भीतर जो कुछ है उम्र ने उसे नहीं बदला। वह मेरे इल्म को समझ ही नहीं पाया। मेरे आक़ा! वह कुछ नहीं समझा। काश, उसे अमीर की ज़हानत और अक़्ल का- जो ख़ुद लुक़मान को भी मात करते हैं- हज़ारवां हिस्सा भी मिला होता।"

    इत्मिनान और मेहरबानी से अमीर मुस्करा दिये। कई दिन से लगातार ख़ोजा नसरुद्दीन अमीर को समझा रहा था कि उनकी दानाई की कोई मिसाल नहीं। इस में वह पूरी कामयाबी भी हासिल कर चुका था। इसलिए अब जब भी वह कोई बात अमीर को समझाता तो वह बहुत ग़ौर से सारी बात सुनते और इस डर से बहस करते कि कहीं उनके इल्म की असली गहराई का पता लग जाय।

    ...अगले दिन बख़्तियार ने कई दरबारियों के सामने अपने दिल का बोझ हलका कियाः "यह नया आलिम तो हम लोगों को बर्बाद कर के छोड़ेगा। जिस दिन टैक्सों की वसूली होती है उसी दिन हम लोगों को अमीर के ख़ज़ाने में आनेवाले रुपयों के सैलाब का कुछ फ़ायदा उठाने और दौलत इकट्ठी करने का मौक़ा मिलता है। लेकिन अब, जब इस सैलाब से कुछ फ़ायदा उठाने का मौक़ा आया है, तब यह मौलाना हुसैन रास्ते में हायल हो गया है। यह फ़ौरन सितारों की कैफ़ियत बताने लगता है। क्या कभी किसी ने यह भी सुना है कि अल्लाह के हुक्म से चलनेवाले सितारे आला शख़्सियतों और बड़े लोगों के लिए तो बदशुगुनी के हों, लेकिन कुछ गुमनाम कारीगरों के लिए, जो मुझे यक़ीन है कि इस वक़्त अपनी कमाई हड़प किये जा रहे हैं और हमें नहीं दे रहे, मुबारक हों? सितारों की ऐसी कैफ़ियत भला सुनी है किसी ने? यह बात किसी किताब में तो लिखी हो नहीं सकती, क्योंकि ऐसी किताब फ़ौरन जला दी गयी होती और उसे लिखने वाले को ला’नत देकर, काफ़िर मुजरिम बताकर मार डाला जाता।"

    दरबारी कुछ बोले नहीं, क्योंकि वे समझ नहीं पा रहे थे कि किस का साथ देने में फ़ायदा है- बख़्तियार का या नये आलिम का।

    बख़्तियार कहता गयाः "टैक्सों की वसूली दिनों-दिन गिरती जा रही है। अब क्या होगा? इस मौलाना हुसैन ने अमीर को यह समझाकर भटका दिया है कि टैक्स वसूली सिर्फ़ थोड़े से दिनों के लिए टाली गयी है, बाद मे ये टैक्स लगाये, बल्कि बढ़ाये भी जा सकते हैं। अमीर उसकी बात का यक़ीन करते है। हम जानते है कि टैक्स मंसूख़ करना आसान है, लेकिन नया टैक्स लगाना बड़ा मुश्किल है। किसी शख़्स को कोई रक़म जब दूसरों की समझने की आ’दत पड़ जाती है, तो आसानी से वह अपनी कमाई उसे दे देता है। लेकिन एक मर्तबा वह ख़ुद उस रक़म को अपने ऊपर ख़र्च करने लगे, तो वह यही चाहेगा कि दुबारा-तिबारा भी यह रक़म अपने ऊपर ही ख़र्च करे।

    "ख़ज़ाना ख़ाली हो जायगा और अमीर के हम दरबारी बर्बाद हो जायेगे। ज़री सी पोशाक पहनने के बजाय हमें सादा मोटा कपड़ा पहनना पड़ेगा। चार बीवियां रखने बजाय दो बीवियों पर ही गुज़र करनी पड़ेगी। चांदी के बर्तननों की जगह, मिट्टी की रकाबियों में खाना खाना पड़ेगा। मुलायम मेमने की जगह पुलाव में गाय का सख़्त गोश्त खाना पड़ेगा, जो सिर्फ़ कुत्तों और कारीगरों के लायक़ होता है। ये ही वे बातें है जो नया आलिम हमारी क़िस्मत में लिखवा रहा है। जो शख़्स यह देखे- समझे, वह अन्धा है उस पर ख़ुदा की मार!"

    नये आलिम के ख़िलाफ़ दरबारियों को उभारने के लिए बख़्तियार इसी तरह बोलता रहा। लेकिन उसकी कोशिश नाकाम रही। अपने नये ओहदे पर मौलाना हुसैन एक के बाद एक कामयाबी हासिल करता गया। तारीफ़ के दिन' तो वह ख़ास तौर पर चमक गया। एक पुरानी रस्म के मुताबिक़ हर महीने अमीर के सामने एक दिन सभी वज़ीर, ओहदेदार, आलिम शायर इकट्ठे होते थे और उनकी तारीफ़ करने में होड़ करते थे। इस में जो अव्वल आता, उसे इनआ’म मिलता। उस दिन हर एक ने अपना-अपना क़सीदा पढ़ा, लेकिन अमीर को तसल्ली नहीं हुयी। वह बोलेः

    "पिछली दफ़ा भी तुम लोगों ने ये ही बातें कही थीं। हम देखते है कि तारीफ़ करने में तुम लोग माहिर और मुकम्मल नहीं हो। तुम लोग अपने दिमाग़ों पर ज़ोर डालने को तैयार नहीं हो। लेकिन, आज हम तुम से काम लेकर मानेंगे। हम सवाल करेंगे और तुम्हें इस तरह जवाब देना होगा कि हमारी तारीफ़ भी हो और जवाब में सच्चाई का पुट भी रहे।

    "ग़ौर से सुनो! हमारा पहला सवाल यहा हैः अगर बुख़ारा के अमीर-ए-आज़म, माबदौलत, बहुत ताक़तवर, और जैसा कि तुम लोगों का दा’वा है, नाक़ाबिल-ए-फ़तह है तो अभी तक पड़ोस के मुस्लिम देशों के सुल्तानों ने हमारी शहंशाहियत को मा नकर अपनी उम्दा सौग़ातें क्यों नहीं भेजीं? हम तुम्हारे जावाबों का इंतिज़ार कर रहे हैं।"

    दरबारी परेशानी में डूब गये। सीधा जवाब देकर वे भिनभिनाने लगे। अकेला ख़ोजा नसरुद्दीन बिना ज़रा भी घबड़ाये बैठा रहा। उसकी बारी आयी तो वह बोलाः

    " अमीर-ए-आज़म मेरे हक़ीर लफ़्ज़ोँ को सुनने की मेहरबानी अ’ता फ़रमाएं। हमारे शहंशाह के सवाल का जवाब बहुत आसान है। पड़ोंस के सभी मुल्कों के सुल्तान हमारे आक़ा की ताक़त के डर से हमेशा कांपते रहते है। वे सोचते है कि 'अगर हम बढ़िया सौग़ात भेजेंगे तो बुख़ारा के ताक़तवर, अज़ीमुश्शान अमीर समझेंगे कि हमारा मुल्क रईस है, जिस से उन्हें फ़ौज लेकर यहां आने और हमारे मुल्क पर कब्ज़ा करने का लालच होगा। लेकिन अगर हम उन्हें मा'मूली सौग़ात भेजें तो वह नाराज़ होकर अपनी फ़ौजें भेज देंगे। बुख़ारा के अमीर बड़े हैं, ताक़तवर है, अज़ीमुश्शान है। सो, हिफ़ाज़त इसी में है कि अपनी नाचीज़ हस्ती की उन्हें याद ही दिलायी जाय।'

    "दूसरे सुल्तानों के दिमाग़ों में भी इसी तरह के ख़याल आते हैं। बढ़िया सौग़ात लेकर अपने सफ़ीर बुख़ारा भेजने की वजह उन लोगों के लगातार डर और अन्देशे की हालत में ढूंढनी होगी जो हमारे शहंशाह की ताक़त ने पैदा कर दी है।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन के जवाब में जो तारीफ़ थी, उस से ख़ुश हो कर अमीर चिल्ला उठेः "वाह! अमीर के सवालों का इसी तरह जवाब दिया जाना चाहिए! सुना तुम लोगों ने? बेवक़ूफ़ों और कुन्दज़हनो! इन से सीखो! वाक़ई, इल्म में मौलाना हुसैन तुम सब से दस गुने बड़े हैं। माबदौलत तुम्हारा शाही तौर पर शुक्रिया अदा करते है, मौलाना साहब! दौड़ कर मीर बकावल ख़ोजा नसरुद्दीन के पास पहुंचा और उस के मुंह में मिठाइयां और हलवा ठूंस दिया। ख़ोजा नसरुद्दीन के गाल फूल गए उस का दम घूटने लगा। गहरी चाशनी उस की ठुड्डी तक बहने लगी।

    अमीर ने उलझन भरे कई और सवाल किये। हर बार ख़ोजा नसरुद्दीन का जवाब सब से बेहतर साबित हुआ।

    "दरबारी का सबसे पहला फ़र्ज़ क्या है?" अमीर ने पूछा।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दियाः "ऐ अज़ीमुश्शान बादशाह! दरबारी का पहला फ़र्ज़ रोज़ाना अपनी रीढ़ को कसरत कराना है। जिस से उसमें ज़रुरी लोच रहे, जिसके बिना वह वफ़ादारी और आदाब का इज़हार कर ही नहीं सकता। दरबारी की रीढ़ को आसानी से हर तरफ़ मुड़ और घूम सकना चाहिए। मा’मूली इंसान की अकड़ी हुई रीढ़ की तरह उसे नहीं होना चाहिए, जो ठीक से झुक कर सलाम करना भी नहीं जानता।"

    बहुत ख़ुश होकर अमीर बोलेः "बहुत ख़ूब! बिल्कुल सही! रीढ़ की रोज़ाना कसरत! वाह, वाह! हम दूसरी बार मौलाना हुसैन के शाही शुक्रिये का ऐ'लान करते हैं।"

    एक बार फिर ख़ोजा नसरुद्दीन के मुहं में गर्म मिठाइयां और हलवा ठूंस दिया गया। उस दिन से बहुत से दरबारियों ने बख़्तियार की जगह ख़ोजा नसरुद्दीन की वफ़ादारी शुरू कर दी। उसी दिन बख़्तियार ने अर्सलां बेग को अपने घर दा’वत दी। नया आलिम दोनों के लिए एक-सा ख़तरनाक था और उसे बर्बाद करने के लिए दोनों ने कुछ दिनों के लिए आपसी अ’दावत ताक़ पर रख दी थी।

    "उसके पुलाव में कुछ मिला देना ठीक रहेगा," अर्सलां बेग ने कहा। वह इस फ़न में माहिर था।

    बख़्तियार बोलाः "लेकिन अमीर हमारे सिर क़लम करवा देंगे। नहीं, अर्सलां बेग साहब, हमें कोई दूसरा तरीक़ा सोचना होगा। हमें हर तरह मौलाना हुसैन के इल्म और अक़्ल की तारीफ़ कर के उसे आसमान पर चढ़ा देना चाहिए, ताकि अमीर के दिल में शुबहा पैदा हो जाय कि कहीं दरबारी लोग मौलाना हुसैन की अक़्ल को अमीर की अक़्ल से भी बढ़कर तो नहीं समझने लगे। हमें लगातार मौलाना हुसैन की तारीफ़ के पुल बांधने चाहिए। तब जल्द ही वह दिन आएगा, जब अमीर को उस से जलन होगे लगेगी। वह दिन मौलाना हुसैन की बड़ाई का आख़िरी और गिरावट का पहला दिन होगा। लेकिन तक़दीर ख़ोजा नसरुद्दीन के साथ थी और उसकी बड़ी से बड़ी ग़लती का नतीजा भी उसी के हक़ में होता।

    अर्सलां बेग और बख़्तियार जब मौलाना हुसैन की तारीफ़ें कर के अपनी तिकड़म में कामयाब हो रहे थे और अमीर के दिल में हसद की पहली चिनगारी जला रहे थे- गो यह चिनगारी अभी छिपी हुई थी- तभी हुआ यह कि ख़ोजा नसरुद्दीन एक भारी भूल कर बैठा।

    एक दिन अमीर के साथ वह बाग़ में फूलों की महक लेता और चिड़ियों के गाने सुनता टहल रहा था। अमीर ख़ामोश थे। इस ख़ामोशी में ख़ोजा नसरुद्दीन को अ’दावत की छिपी झलक महसूस हुई। लेकिन वह इस अ’दावत की वजह नहीं समझ पा रहा था।

    अमीर ने पूछाः "उस बुड्ढे- तुम्हारे क़ैदी- का क्या हाल है? क्या तुमने उसका असली नाम और बुख़ारा आने का सबब जान लिया?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन के ख़यालों में इस वक़्त बसी हुई थी गुलजान। सो उसने अनमने ढंग से जवाब दियाः "ऐ बादशाह सलामत! इस नाचीज़ ग़ुलाम की ख़ता मुआ’फ़ फ़रमाएं। अभी तक मैं उस बुड्ढे से एक लफ़्ज़ भी नहीं क़ुबूलवा पाया हूं। वह तो मछली की तरह एकदम गूंगा है।"

    "क्या तुम ने उसे तकलीफ़ें देने की कोशिश की ?"

    "जी हां, आक़ा-ए-नामदार ! परसों मैं ने उसकी गांठों को उमेठा। कल दिन भर गर्म चिमटे से मैं उसके दांत हिलाता रहा।"

    अमीर ने ताईद करते हुए कहाः "दांत ढीले करना तो अच्छी सज़ा है। तअ’ज्जुब है कि वह तब भी ख़ामोश रहा। तुम्हारी मदद के लिए किसी तजरबा-कार, होशियार जल्लाद को भेजूं!"

    "नहीं, हुज़ूर! आप अपने आप को ऐसी फ़िक्रों से परेशान करें। कल मैं उसे एक नये ढंग की सज़ा दूंगा। बूढ़े की ज़बान और मसूड़ों में मैं जलता हुआ बरमा घुसेडूंगा।"

    "ठहरो ! ठहरो!" अमीर चिल्लाये। उस का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था। "अगर तुम उस की ज़बान जलते हुए बरमे से छेद दोगे, तो वह अपना नाम कैसे बतायेगा? मौलाना हुसैन! तुम ने इस बात पर ग़ौर किया ही नहीं, या किया था? देखो न, अमीर-ए-आज़म, माबदौलत, ने फ़ौरन इस बात पर ग़ौर किया और तुम्हें एक बहुत बड़ी ग़लती करने से रोक लिया। इस से साबित है कि हालांकि तुम एक लासानी आ'लिम हो, तो भी हमारी दानाई तुम से बढ़-चढ़कर है। तुमने अभी-अभी यह बात देखी है न?"

    बेहद ख़ुश अमीर ने दमकते चेहरे से हुक्म दिया कि दरबारी फ़ौरन बुलाये जाये। दरबार लग गया। अमीर ने पहुंच कर ऐ’लान किया कि आज के दिन उन्हों ने मौलाना हुसैन से ज़ियादा दानाई दिखायी है और एक ऐसी ग़लती करने से उन्हें रोक लिया है, जो वह करने ही वाले थे। दरबार के मुहर्रिर ने बड़ी मेहनत से अमीर के बयान का एक-एक लफ़्ज़ दर्ज किया ताकि आगे आने-वाली नस्लें उन्हें भूल जायें।

    उस दिन के बाद से अमीर के दिल में जलन पैदा नहीं हुई। इस तरह, इस इत्तिफ़ाक़िया ग़लती से ख़ोजा नसरुद्दीन ने दुश्मनों की काइयां तिकड़मों को बेकार कर दिया।

    तब भी दुविधा में पड़े ख़ोजा नसरुद्दीन को, लम्बे, और परेशान करनेवाले घंटों में रोज़-ब-रोज़ ज़ियादा तकलीफ़ होती। बुख़ारा शहर के आसमान पर पूरा चांद अपनी छटा बिखेर रहा था। अनगिनत मीनारों पर पालिशदार खपरैलें चमक रही थीं। बुनियादों के बड़े-बड़े पत्थर नीले कुहासे से ढंके थे। हल्की हवा हौले-हौले चल रही थी। ऊपर छतों पर ठंडक थी। लेकिन नीचे, जहां ज़मीन और धूप से तपी दीवारों को रात की हवा में ठंडा होने का वक़्त मिला था, दम घोटनेवाली गर्मी थी। महल, मस्जिदों झोंपड़ों में- हर तरफ़- नींद छायी थी। महज़ उल्लू अपनी तीखी आवाज़ों से पाक शहर के गर्म आराम में ख़लल डाल रहे थे।

    ख़ोजा नसरुद्दीन खुली खिड़की में बैठा था। उस के दिल को यक़ीन था कि गुलजान अभी सोयी नहीं है, कि वह जाग रही है और उसी के बारे में सोच रही है। शायद , इस घड़ी वे दोनों एक ही मीनार को ताक रहे हों, मगर एक-दूसरे को देख पा रहे हों, क्योंकि उन के बीच दीवारों, लोहे के सीख़चोंवाली जालियों, ज़नखों, पहरेदारों और बूढ़ी औरतों की रोकें थीं। ख़ोजा नसरुद्दीन को महल में घुसने का मौक़ा तो मिल गया था, लेकिन हरम में पहुंचने का अब भी कोई रास्ता नहीं था। कोई इत्तिफ़ाक़ी वाक़िआ ही उसे वहां पहुंचाने का रास्ता बता सकता था। लगातार वह ऐसे ही मौक़े की तलाश में था, लेकिन बेकार। गुलजान तक कोई ख़बर भिजवाने में अब तक वह कामयाब हुआ था। झरोके में बैठे-बैठे हवा को चूम कर उस ने कहाः "ऐ हवा! तेरे ले यह काम बहुत आसान है। एक लम्हे के लिए गुलजान की खिड़की से होकर भीतर चली जा, उस के होंठ और कान छू। उसे मेरा प्यार दे और मेरा संदेशा उस से कह। उस से कह कि मैं उसे भूला नहीं हूं। उस से कह कि मैं आऊंगा, ज़रूर आऊंगा और तुझे छुड़ा लूंगा।"

    हवा तेज़ी से निकल गयी। ग़मज़दा ख़ोजा नसरुद्दीन को वह जहां का तहां छोड़ गयी। परेशानियों मुसीबतों के दिन एक के पीछे एक इसी तरह गुज़रते रहे। रोज़ ही ख़ोजा नसरुद्दीन को दरबार-ए-आ’म में पहुंच कर अमीर का इंतिज़ार करना पड़ता, दरबारियों की चापलूसी सुननी पड़ती, बख़्तियार की काइयां साज़िशों की असलियत समझनी पड़ती और ज़हर से बुझी उस की नज़र देखनी पड़ती। फिर, अमीर के सामने बन्दगी करनी पड़ती, उनकी तारीफ़ें गानी पड़तीं और दिल में नफ़रत छिपाये घंटों उन का ऐ’याश और थलथल चेहरा देखते रहना पड़ता, कैफ़ियत समझानी पड़ती। ख़ोजा नसरुद्दीन इन सब से इतना ऊब गया था और इतना थक गया था कि अब उस ने नयी वजहें ढूंढनी बन्द कर दी थीं। हर बात

    को- चाहे अमीर का सिरदर्द हो, चाहे ग़ल्ले की महंगाई- उन्हीं लफ़्ज़ों और क़ेरानों (योगों) के ज़रिये समझाना शुरू कर दिया था।

    मक्खी की तरह भनभनाता हुआ वहा कहताः "सितारे सा’द-अल-ज़बीह दल्ब (कुम्भ) के बुर्ज (राशि) के मुख़ालिफ़ है और सैयारा मुश्तरी अक़रब (वृश्चिक) के बुर्ज के बायें पर है। कल रात अमीर को नींद आने की यही वजह थी।"

    अमीर दोहरातेः "सितारे सा’द-अल-ज़बीह सैयारे मुश्तरी के मुख़ालिफ़ है... मुझे यह याद कर लेना चाहिए... फिर से तो कहना, मौलाना हुसैन...।"

    अमीर की याद-दाश्त बहुत कमज़ोर थी।

    अगले दिन फिर वही बातचीत शुरू होतीः "पहाड़ियों पर मवेशियों की मौत का सबब यह है कि सितारा सा’द-अल-ज़बीह दल्ब के बुर्ज में है, और सैयारा मुश्तरी अक़रब के बुर्ज के मुख़ालिफ़ है…।"

    "तो सितारे सा’द-अल-ज़बीह ... मुझे यह याद कर लेना चाहिए," अमीर फिर कहते।

    थक कर ख़ोजा नसरुद्दीन सोचने लगताः "या ख़ुदा! यह कैसा बे-वक़ूफ़ है। यह तो मेरे पिछले मालिक से भी बढ़-चढ़कर बे-वक़ूफ़ निकला। मैं तो इस से ऊब उठा हूं। अल्लाह, कब मैं इस महल से छुटकारा पाऊंगा!"

    इस बीच अमीर बातचीत का कोई दूसरा सिलसिला शुरू कर देतेः "मौलाना हुसैन! हमारे राज में हर तरफ़ अमन-चैन है, रिआया ख़ुश है। अब बद-मआ’श ख़ोजा नसरुद्दीन का ज़िक्र भी सुनायी नहीं पड़ता। कहां चला गया है वह ? वह ख़ामोश क्यों है? हमें यह बाइये तो सही!"

    थकान से चूर ख़ोजा नसरुद्दीन वे ही बातें भनभनाना शुरु कर देता जो वह पहले कितनी ही बार दोहरा चुका थाः "ऐ बादशाह सलामत! क़ादिर-ए-मुतलक़! सितारे सा’द-अल-ज़बीह... और इसके अलावा, अमीर-ए-आज़म, बद-मआ’श ख़ोजा नसरुद्दीन बग़दाद जा चुका है। मेरे इल्म के बारे में उसे ज़रूर जानकारी है। जब उसे पता चला कि मैं बुख़ारा गया हूं, तो वह डर और कंपकंपी के मारे फ़ौरन छिप गया, क्योंकि वह जानता था कि मैं उसे कितनी आसानी से गिरफ़्तार कर सकता हूं।"

    "गिरफ़्तार ? यह तो बहुत ही अच्छी बात होगी! लेकिन उसे गिरफ़्तार करोगे कैसे?" अमीर पूछते। "इस के लिए मैं सितारे सा’द-अल-ज़बीह और सैयारे मुश्तरी के मुबारक बुर्ज में पहुंचने का इंतिज़ार करूंगा।"

    अमीर दोहरातेः "सैयारा मुश्तरी.. मुझे याद रखना चाहिए। मौलाना हुसैन! क्या तुम्हें मा’लूम है कि कल माबदौलत को एक बुहत बढ़िया ख़याल आया। हम ने सोचा कि बख़्तियार को निकाल कर तुम्हें वज़ीर-ए-आज़म बना दिया जाय।"

    इस पर ख़ोजा नसरुद्दीन को अमीर के सामने ज़मीन पर लेटकर कोर्निश करनी पड़ी, उनकी तारीफ़ें करनी पड़ी, उनका शुक्रिया अदा करना पड़ा और उन्हें समझाना पड़ा कि सितारे सा’द-अल-ज़बीह की कैफ़ियत इस वक़्त वज़ीरों में तब्दीली के लिए बदशुगुनी की है। उस ने मन ही मन सोचा, अब जल्द यहां से भाग निकलने का वक़्त गया है।

    मौक़े की तलाश में ख़ोजा नसरुद्दीन नाउम्मीदी की कठिन डगर काट रहा था।

    उस का दिल बाज़ार, भीड़, चायख़ानों, धुंए-भरी सरायों के लिए ललक उठता। अमीर के बढ़िया से बढ़िया लज़ीज़ खाने को वह बाज़ार के सस्ते पुलाव की कड़ी बोटियों या प्याज़ चरपरी काली मिर्चोवाली पाये के शोरबे से बदलने को तैयार था।

    चापलूसी और तारीफ़ के बदले सादी बातचीत और ज़ोर की दिल-खोल हंसी के लिए वह अपने सोने के लिबास को फ़ौरन दे डालने को तैयार था। लेकिन क़िस्मत ख़ोजा नसरुद्दीन का इम्तिहान ले रही थी और उसे वह मौक़ा नहीं दे रही थी, जिस का वह इतनी बेताबी से इंतिज़ार कर रहा था। इस बीच अमीर लगातार उस से पूछताछ करते रहते कि अपनी नयी दाश्ता का नक़ाब उठाने का मौक़ा कब पायेंगे, या’नी सितारे कब मुबारक होंगे।

    ।। 2 ।।

    अमीर ने ख़ोजा नसरुद्दीन को एक दिन बे-वक़्त बुला भेजा। अभी तड़का था। सारा महल सो रहा था। फ़व्वारे नाच रहे थे। फ़ाख़्ताएँ ग़ुटुर-ग़ू- ग़ुटुर-ग़ू करती हुई पर फड़फड़ा रही थीं। शाही आरामगाह जाते वक़्त लाल और सफ़ेद ज्यराब पत्थर की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन सोचने लगाः "अमीर को मुझ से इस वक़्त क्या काम हो सकता है?"

    रास्ते में उस की मुलाक़ात बख़्तियार से हुई जो आरामगाह से चुपचाप साये की तरह निकला था। बिना रुके उनकी दुआ-सलाम हुई। ख़ोजा नसरुद्दीन को लगा कि कोई साज़िश की गयी है और वह होशियार हो गया। आरामगाह में उसे ख़्वाजा-सरा मिला। अस्मत मआब ख़्वाजा-सरा शाही कौच के सामने पड़ा ज़ोर-ज़ोर से कराह रहा था। उस के पास ही क़ालीन पर सोने की मूठवाले बेंत के टुकड़े बिखरे पड़े थे।

    भारी-भरकम मख़मली पर्दे सुब्ह की ताज़ी हवा, सूरज की किरनों और चिड़ियों की चहचहाट को आरामगाह में घुसने से रोक रहे थे। लैम्प से हलकी रोशनी फैल रही थी। मा’मूली मिट्टी के दिये के लैम्प की तरह इस से भी बू और धुंआ निकल रहा था।

    एक कोने में नक़्क़ाशी-दार धूपदान से मीठी चरपरी महक रही थी। लेकिन लैम्प में जलती भेड़ की चर्बी की बू पर यह महक क़ाबू पा रही थी। आरामगाह की हवा इतनी घुटी हुई थी कि ख़ोजा नसरुद्दीन की नाक खुजलाने लगी और गले में खरखराहट पैदा हो गयी। अमीर रेशमी लिहाफ़ के बाहर बालों भरी टांगें लटकाये बैठे थे। ख़ोजा नसरुद्दीन ने देखा कि उनकी एड़ियां गहरी पीली हैं मानो उन्हें एक हिन्दुस्तानी धूपदान के ऊपर सेंकते रहे हों।

    "मौलाना हुसैन!" अमीर बोलेः "माबदौलत बहुत ग़मज़दा हैं। हमारा ख़्वाजा-सरा, जिसे तुम यहां पड़ा देख रहे हो, इस ग़म का सबब है।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन घबरा उठाः "ओह!शहंशाह, क्या इस ने कोई गुस्ताख़ी करने की मजाल की थी?"

    "अरे नहीं!" अमीर ने हाथ हिला कर मुंह बनाते हुए कहा। "अपनी अक़्लमन्दी से हम ने पहले ही सब बातें सोच-समझ कर होश्यारी बरत रखी थी। भला इस की मज़ाल ऐसी हो ही कैसी सकती थी? इसे ख़्वाजा- सरा बनाने से पहले ही पूरी होश्यारी बरती गयी थी। नहीं, वह बात नहीं है। हमें आज पता लगा है कि यह बद-मआ’श हिजड़ा, सल्तनत के सब से बड़े ओहदों में से एक पर मुक़र्रर किये जाने की हमारे मेहरबानी भूल कर, अपना फ़र्ज़ पूरा करने में ग़फ़लत करता रहा है।"

    इस बात का फ़ायदा उठाकर कि इधर हम अपनी रखैलों के पास नहीं जा रहे हैं, इस ने तीन दिन तक लगातार हरम जाकर हशीश (गांजा) पीने की लत में मशग़ूल रहने की गुस्ताख़ी की है। और हमारी दाश्ताएं, अपने को अकेला पाकर, आपस में लड़ती-झगड़ती रहीं और एक-दूसरे के मुंह और बाल नोचती रहीं। ज़ाहिर है, इस से बहुत नुक़सान हुआ है, क्योंकि नुचे हुए मुंह या गंजे सर वाली औरत हमारी निगाह में मुकम्मल हुस्न वाली नहीं होती। अ’लावा इसके, एक दूसरी बात भी हुई, जिस का हमें बहुत अफ़्सोस है। हमारी नयी दाश्ता बीमार पड़ गयी है। तीन दिन से उसने खाना नहीं खाया।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन चौंक उठा। अमीर ने इशारे से उसे ख़ामोश किया।

    "ठहरो! अभी हम ने बात ख़त्म नहीं की। वह बीमार है और शायद बचे नहीं। अगर हम उस से एक मर्तबा मिल चुके होते तो उस की बीमारी या मौत से हमें ज़ियादा तकलीफ़ होती। लेकिन, मौलाना हुसैन! तुम ख़ुद समझ सकते हो कि जो हालत है उस से हम किस क़दर नाराज़ हैं। इसलिए," अमीर ने यहां ऊंची आवाज़ की, "हम ने तय किया है कि आइन्दा की परेशानियों और तकलीफ़ों से बचने के लिए हम इस बद-मआ’श गंजेड़िये को अपने ओहदे से बरख़ास्त कर दें और इसे दो सौ कोड़ों की सज़ा दें। जहां तक तुम्हारा तअ’ल्लुक़ है, मौलाना हुसैन, हम ने तुम्हें हरम के ख़्वाजा-सरा की ख़ाली जगह पर मुक़र्रर करने की मेहरबानी फ़रमायी है।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन को लगा कि उस की सांस गले में फंस कर रह गयी है। उसे अपने पेट में अ’जब ठंडापन महसूस हुआ। पैरों में कमज़ोरी मा’लूम हो रही थी।

    भवें चढ़ा कर नाराज़ी से अमीर ने पूछाः "क्या तुम बहस करना चाहते हो, मौलाना हुसैन? हमारी शाही शख़्सियत की ख़िदमत करने की ख़ुशी हासिल करने की बजाय क्या तुम नाकाम और चन्दरोज़ा हवस को पूरा करना चाहते हो?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन अब तक सम्हल चुका था और होश-हवास दुरुस्त कर चुका था। झुक कर कोर्निश करता हुआ बोलाः " अल्लाह हमारे ताजदार का साया हमेशा हमारे सर पर क़ायम रखे। मुझ नाचीज़ ग़ुलाम पर अमीर की बेशुमार मेहरबानियां है। हमारे शहंशाह-ए-आज़म को अपनी रिआ’या के दिल की पोशीदा से पोशीदा ख़्वाहिशें मा’लूम कर लेने का जादू जैसा हुनर हासिल है। बहुत मर्तबा मुझ नाचीज़ ग़ुलाम ने इस काहिल और बे-वक़ूफ़ इंसान की जगह, जो इस वक़्त बिल्कुल मुनासिब सज़ा पा कर फ़र्श पर पड़ा रो रहा है, लेने की तमन्ना की है। जाने कितनी बार यह तमन्ना मेरे दिल में उठी। लेकिन मैं अमीर से इस का ज़िक्र करने की हिम्मत नहीं कर पाया। अब चूंकि हुज़ुर ने ख़ुद ही…"

    ख़ुश हो कर अमीर ने मुलायमियत से कहाः "तो फिर देर क्यों हो? माबदौलत अभी हकीम को बुलाते है। वह अपने चाकू ले आयेगा और तुम उस के साथ कहीं तन्हाई में चले जाना। इस बीच हम बख़्तियार को बुला कर तुम्हें ख़्वाजा-सरा मुक़र्रर करने का हुक्म जारी करते हैं।"

    अमीर ने ताली बजायी।

    दरवाज़े की तरफ़ घबराहट से देख़ता हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन जल्दी से बोलाः "बादशाह सलामत इस नाचीज़ के हक़ीर लफ़्ज़ों को सुनने की तकलीफ़ फ़रमाएं। मैं बख़ुशी फ़ौरन हकीम के साथ तनहाई में जाने को तैयार हूं। सिर्फ़ बादशाह की ख़ुशी की फ़िक्र मुझे ऐसा करने से रोक रही है। हकीम से मिलने के बाद मुझे कई दिन बिस्तरे पर गुज़ारने पड़ेगे और इस बीच नयी दाश्ता मर भी सकती है। तब तो अमीर का दिल सदमें के धुन्ध से घिर जायगा और इस बात का ख़याल भी इस ग़ुलाम को बर्दाश्त नहीं हो सकता। इसलिए मेरी सलाह तो यह है कि पहले उस दाश्ता की सेहत को ठीक कर दिया जाय और फिर मैं अपने को हकीम के सुपुर्द कर के ख़्वाजा-सरा के ओहदे के क़ाबिल बनने की तैयारी में लग जाऊं…"

    "हूं!" शक की निगाह से नसरुद्दीन को देखते हुए अमीर ने कहा।

    "ऐ आक़ा ! उस ने तीन दिन से खाना नहीं खाया है।"

    "हूं!" अमीर फिर बोले। फिर वह फ़र्श पर पड़े हिजड़े की तरफ़ पलटे और बोलेः "अबे! मकड़ी की नाक़िस औलाद! जवाब दे! क्या हमारी नयी दाश्ता बीमार है और क्या हमें उस की मौत का अंदेशा होना चाहिए?"

    जवाब के इंतिज़ार में ख़ोजा नसरुद्दीन की रीढ़ पर ठंडा पसीना गया।

    "ऐ अज़ीमुश्शान अमीर!" हिजड़े ने जवाब दिया। "वह बहुत दुबली हो गयी है और नये चांद के मानिन्द पीली पड़ गयी है। उस का चेहरा मोम जैसा हो गया है और उंगलियां ठंड़ी पड़ गयी है। बूढ़ी औ’रतें कह रही है कि ये आसार बहुत ख़राब है…"

    अमीर सोच में पड़ गये। ख़ोजा नसरुद्दीन साये में हो गया। इस वक़्त वह आरामगाह के धुंआ भरे अंधेरे का शुक्र गुज़ार था, क्योंकि इस से उस के चेहरे का पीलापन छिप गया था।

    आख़िर अमीर बोलेः "हां! अगर ऐसी बात है, तो शायद वह सचमुच मर जाय। उस के मरने से हमें सदमा होगा। लेकिन मौलाना हुसैन, क्या तुम्हें यक़ीन है कि तुम उसे अच्छा कर दो गे?"

    "हुज़ूर-ए-आ’ला को मा’लूम है कि बग़दाद से बुख़ारा तक मुझ से ज़ियादा होशियार दूसरा हकीम नहीं है।"

    "जाओ मौलाना हुसैन, उस के लिए दवा तैयार करो।"

    "जहांपनाह, मुझे पहले उस की बीमारी का पता लगाना होगा। इस के लिए मुझे जांच करनी होगी।"

    "जांच?" अमीर हंसे। "मौलाना हुसैन! जब तुम ख़्वाजा-सरा बन जाओ तब इत्मिनान से उस की जांच कर लेना।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन झुक कर ज़मीन से लग गयाः "बादशाह सलामत! मुझे जांच..."

    "नाचीज़ ग़ुलाम!" अमीर चिल्लाये। "क्या तू जानता नहीं कि मौत से पहले कोई भी इंसान हमारी दाश्ताओं के चेहरे नहीं देख सकता है ?"

    "बादशाह सलामत," ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया, "मैं यह बात जानता हूं। लेकिन मेरा मतलब उस के चेहरे की जांच करने से नहीं था। उस के चेहरे की तरफ़ नज़र उठाने की गुस्ताख़ी मैं कभी कर ही नहीं सकता। मुझे अपने पेशे का इतना ज़ियादा इल्म हैं कि मैं नाख़ुनों की रंगत देख कर ही बीमारी का पता लगा सकता हूं। इसलिए, मेरे लिए उस का हाथ देख लेना ही काफ़ी होगा।"

    "हाथ?" अमीर बोले। "यह तुम ने पहले क्यों नहीं कहा, ताकि मुझे ग़ुस्सा आता? हाथ ? हां, यह तो हो सकता है। तुम्हारे साथ हम हरम में चलेंगे। हमें उमीद है कि तुम हमारी दाश्ता का सिर्फ़ हाथ देखोगे तो हमें हसद होगी।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने तसल्ली देते हुए कहाः "बादशाह सलामत को क़तई हसद नही होगी।"

    वह सोच रहा था कि गुलजान से अकेले में तो कभी मुलाक़ात हो नहीं सकेगी और किसी किसी गवाह की मौजूदगी ज़रुरी है, इसलिए बेहतर है कि गवाह ख़ुद अमीर हों, ताकि वह शक-शुबहा कर सके।

    ।। 3 ।।

    आख़िर हरम में पैर रखने का ख़ोजा नसरुद्दीन को वह मौक़ा मिल ही गया, जिस की तलाश में वह इतने दिनों से बेचैन था। अदब से झुक कर पहरेदार एक तरफ़ को हट गये। पत्थरों का ज़ीना पार कर अमीर के पीछे-पीछे चलते ख़ोजा नसरुद्दीन ने लकड़ी का एक फाटक पार किया और एक ख़ूबसूरत बाग़ीचे में जा पहुंचा। यहां ढेरों गुलाब, गुलबहार गुलमेहदी के फूलों के बीच काले और सफ़ेद संगमर्मर के हौज़ोँ में फ़व्वारे चल रहे थे और उन पर हलकी भाप छायी हुई थी।

    फूलों और घास पर शबनम की बूंदे चमक रही थीं।

    ख़ोजा नसरुद्दीन पर एक रंग आता था, एक जाता था। हिजड़े ने अख़रोट की लकड़ी का नक़्क़ाशी-दार दरवाज़ा खोला। अन्दर के अंधेरे हिस्से से काफ़ूर, मुश्क और गुलाब के इत्र की गहरी ख़ुशबू आयी। यही वह हरम था जहां अमीर की हसीन दाश्ताएं क़ैद थीं। ख़ोजा नसरुद्दीन ने बड़ी होश्यारी से कोनों, नुक्कड़ों, मोड़ों और गलियों का हिसाब लगाया ताकि फ़ैसलाकुन मौक़े पर वह रास्ता भूल जाय और इस तरह अपने और गुलजान के ऊपर मुसीबत बरपा करे। दिल ही दिल में वह याद करता जाता थाः "दाहिने, फिरे बाये, यहां रहा ज़ीना- जिस पर एक बुढ़िया का पहरा है, अब फिर दाहिने…"

    रंगीन चीनी शीशों से छनकर आनेवाली नीली, हरी, गुलाबी रोशनी से रास्ता रौशन था। नीचे एक महराबी दरवाज़े के सामने हिजड़ा रुक गया।

    "ऐ मेरे आक़ा, यहीं है वह।"

    अमीर के पीछे-पीछे ख़ोजा नसरुद्दीन ने भी उस दरवाज़े को पार किया जिस के अन्दर उसकी क़िस्मत क़ैद थी। कमरा छोटा था। उस का फ़र्श दीवारें क़ालीनों से ढंकी थीं। ताक़ोँ पर सींक की टोकरियों में बुन्दे, गुलूबन्द, बाज़ूबन्द रखे थे और चांदी का एक बड़ा आईना दीवार से लटक रहा था। बेचारी गुलजान ने इतनी दौलत सपने में भी नहीं देखी थी। ख़ोजा नसरुद्दीन ने मोती-जड़ी उस की जूतियां देखीं तो सिहर उठा। जूतियों की एड़ियां घिसने का वक़्त गुलजान ने यहीं गुज़ारा था।

    कमरे के एक कोने में रेशम के एक पर्दे की तरफ़ इशारा करता हुआ हिजड़ा बोलाः "वहां सो रही है वह।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन को फुरफुरी गयी। इतने क़रीब थी उस की दिलरुबा। अपने को डांट कर उस ने मन ही मन कहाः

    "ख़ोजा नसरुद्दीन! ख़बरदार! ज़ब्त तर! फ़ौलाद बन जा।"

    वह पर्दे के पास पहुंचा तो नींद में ग़ाफ़िल गुलजान की सांसे सुनायी दीं। मसहरी के ऊपर उस ने रेशम को उठते-गिरते देखा। उसका गला भर आया और आवाज़ फंस गयी- मानो लोहे मं जकड़ दी गयी हो। आंखों से आंसू बहने लगे और सांस थम गयी।

    "मौलाना हुसैन," अमीर ने कहा, "क्या बात है? इतनी सुस्ती क्यों दिखा रहे हो?"

    "बादशाह सलामत! मैं उस की सांसें सुन रहा हूं। पर्दे के पीछे से मैं नाज़नीन के दिल की धड़कनों को सुनने की कोशिश कर रहा हूं। हुज़ूर, इस का नाम क्या है?"

    "इस का नाम है- गुलजान।" अमीर ने जवाब दिया।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने हौले से पुकाराः "गुलजान!"

    मसहरी के ऊपरी हिस्से पर उठता-गिरता रेशम रुका। गुलजान जाग गयी थी। वह सांस रोके पड़ी थी। उसे यक़ीन नहीं रहा था कि सचमुच वह अपने प्यारे की आवाज़ सुन रही है। वह सोच रही थी- शायद यह सपना है।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने फिर पुकाराः "गुलजान!"

    इस बार गुलजान के मुंह से एक हल्की सी चीँख़ निकली।

    ख़ोजा नसरुद्दीन जल्दी से बोलाः "मेरा नाम मौलाना हुसैन है। मैं नया हकीम, नजूमी आ’लिम हूं। अमीर की ख़िदमत के लिए मैं बग़दाद से आया हूं। तुम समझ रही हो न, गुलजान! मैं नया हकीम, नजूमी आ’लिम हूं। मेरा नाम मौलाना हुसैन है।"

    अमीर की तरफ़ पलटकर वह बोलाः "किसी सबब से मेरी आवाज़ सुनकर यह डर गयी है। मुमकिन है कि शहंशाह की ग़ैर-मौजूदगी में हिजड़ा इस से बेरहमी से पेश आया हो।"

    अमीर ने लाल-लाल आंखों से हिजड़े को ताका। कांप कर वह ज़मीन तक झुक गया। बोलने तक की उसकी हिम्मत हुई।

    ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः "ऐ गुलजान, तुम्हारे सिर पर ख़तरा मंडरा रहा है। लेकिन मैं तुम्हें बचा लूंगा। तुम्हें मुझ पर पूरा यक़ीन करना चाहिए। मैं हर मुश्किल और मुसीबत पर क़ाबू पा सकता हूं।"

    "बग़दाद के आ’लिम, मौलाना हुसैन," गुलजान धीमी और बारीक आवाज़ में बोली, "मैं आपकी बातें सुन रही हूं। मैं आप को जानती हूं और आप का यक़ीन करती हूं। मैं यह सब ख़ुद शहंशाह की मौजूदगी में कहती हूं जिन के क़दम मुझे पर्दे के बीच की दराज़ से दीख रहे है।"

    इस बात का ख़याल रखते हुए कि अमीर की मौजूदगी में उसे आलिमाना और इज़्ज़तदार लहजे में ही बातें करनी चाहिए, ख़ोजा नसरुद्दीन ज़रा सख़्ती से बोलाः "ज़रा मुझे अपना हाथ दो गुलजान, ताकि तुम्हारे नाख़ुनों के रंग से ही मैं तुम्हारी बीमारी का सबब जान सकूं।"

    रेशम का पर्दा कुछ हिला और एक तरफ़ सरका। ख़ोजा नसरुद्दीन ने आहिस्ता से गुलजान का नाज़ुक हाथ थाम लिया। सिर्फ़ उसका हाथ दबाकर ही वह अपने दिल की बात कह सकता था। गुलजान ने भी जवाब में उसका हाथ हौले से दबाया। ख़ोजा नसरुद्दीन देर तक उस की हथेली देख़ता रहा।

    मन ही मन वह सोच रहा थाः "कितनी दुबली हो गयी है बेचारी!"

    उस के दिल में एक हूक-सी उठी। अमीर उसके कन्धे पर से झांक रहा था। उसके कानों पर अमीर की गहरी सांस सुनायी पड़ रही थी। ख़ोजा नसरुद्दीन ने गुलजान की सबसे छोटी उंगली का नाख़ून अमीर को दिखाया और बहुत बदशुगुनी के ढंग से सिर हिलाया। हालांकि यह नाख़ून भी बिल्कुल दूसरे नाख़ुनों जैसा ही था, लेकिन अमीर ने उस में कुछ अ'जब चीज़ भांप ली, होंठ भींचे और जानकारी की निगाह से ख़ोजा नसरुद्दीन को देखा।

    "कहां दर्द होता है?" ख़ोजा नसरुद्दीन ने पूछा।

    "दिल में।" लम्बी सांस लेकर गुलजान बोली। "मेरा दिल ग़म और चाहत के दर्द से भरा है।"

    "तुम्हारे ग़म की वजह?"

    "वजह है यह कि जिस से मैं मुहब्बत करती हूं, वह मुझ से जुदा है।"

    "यह बीमार है," ख़ोजा नसरुद्दीन ने अमीर के कान में फुसफुसाया, "क्योंकि यह शहंशाह से जुदा है।"

    ख़ुशी से अमीर का चेहरा खिल उठा। उन की सांस ज़ोर से चलने लगी।

    "मैं जिस से मुहब्बत करती हूं, वह मुझ से जुदा है," गुलजान बोली, "और अब मुझे लगता है कि मेरा प्यारा बिल्कुल क़रीब है। लेकिन मैं तो उसे गले लगा सकती हूं, उस से प्यार कर सकती हूं। हाय! वह दिन कब आयेगा जब वह मुझे दिल से लगायेगा और अपने नज़दीक रखेगा।"

    "या अल्लाह!" बनावटी अचम्भे से ख़ोजा नसरुद्दीन बोला "इतने थोड़े अर्से में ही बादशाह सलामत ने इसके दिल में किस क़दर हवस जगा दी है! वल्लाह! वल्लाह!"

    ख़ुशी के मारे अमीर आपे से बाहर हो गये। वह एक जगह खडे नहीं रह पा रहे थे। आस्तीन से मुंह छिपाये, बे-वक़ूफ़ी से 'ही-ही' करते हुए उछल-कूद रहे थे।

    ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः "ऐ गुलजान! तुम फ़िक्र करो। जिस से तुम मुहब्बत करती हो, वह तुम्हारी बात सुन रहा है।"

    अपने पर क़ाबू रखने में मजबूर अमीर बीच में ही बोल उठेः "बेशक, बेशक, गुलजान! वह सुन रहा है! तेरा प्यार तेरी बात सुन रहा है!"

    पर्दे के पीछे से पानी की सुहावनी कलकल जैसी हंसी उठी।

    लेकिन ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहना जारी रखाः "ऐ गुलजान! ख़तरा तुम्हारे सिर पर मंडरा रहा है। लेकिन डरो मत! मैं, मशहूर आलिम, नजूमी और हकीम मौलाना हुसैन, तुम्हें बचा लूंगा।"

    अमीर ने भी ये ही लफ़्ज़ दोहरायेः

    "हां, हां! यह तुम्हें बचा लेंगे! ज़रूर बचा लेंगे!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन कहता गयाः "सुना तुम ने, शहंशाह क्या फ़रमा रहे हैं? सुन रही हो न? तुम मुझ पर यक़ीन रखो। ख़तरे से मैं तुम्हें बचा लूंगा। तुम्हारी ख़ुशी का दिन बहुत नज़दीक है। फ़िलहाल, बादशाह सलामत तुम्हारे पास नहीं सकेंगे क्योंकि मैं ने उन्हें आगाह कर दिया है कि सितारों का हुक्म है कि वह किसी औ’रत का नक़ाब छुयें। लेकिन सितारे अपना अंदाज़ बदल रहे हैं। तुम समझ रही हो न, गुलजान? सितारे अपना अंदाज़ बदल रहे हैं! जल्द ही सितारे मुबारक होंगे और तुम अपने प्यारे की बाहों में होगी। जिस दिन मैं तुम्हें दवा भेजूंगा उस का अगला दिन तुम्हारी ख़ुशी का दिन होगा। समझ रही हो तुम मेरी बात? हां, दवा पाने के अगले दिन तुम तैयार रहना!"

    ख़ुशी से हंसती और रोती हुयी गुलजान बोलीः

    "शुक्रिया! मौलाना हुसैन, लाख-लाख शुक्रिया। बीमारियों का लासानी इलाज करनेवाले दाना आ’लिम, आपका शुक्रिया! मेरा प्यारा मेरे नज़दीक है। मुझे लगता है कि मेरे और उसके दिल की धड़कन एक हो गयी है।"

    अमीर और ख़ोजा नसरुद्दीन वापस लौटे। ख़्वाजा सरा दौड़ कर फाटक पर आया और घुटनों के बल गिर कर बोलाः "ऐ मेरे आक़ा! वाक़ई, ऐसा होशियार हकीम दुनिया में दूसरा नहीं। तीन दिन से वह बिना हिले-डुले पड़ी थी। लेकिन अब यकायक पलंग छोड़ कर वह उठ बैठी है। वह गा रही है, हंस-हंस कर नाच रही है। हुज़ूर, मैं उस के पास गया तो उस ने मेरे कान पर घूंसा जड़ने की मेहरबानी की।"

    "सचमुच वह मेरी ही गुलजान!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने सोचा। "अपने घूसों का इस्तेमाल करने में गुलजान हमेशा फुर्ती दिखाती है।"

    सुब्ह के खाने के वक़्त अमीर ने सभी दरबारियों को बख़्शिश दी। ख़ोजा नसरुद्दीन को उन्होंने दो थैलियां दी- चांदी के सिक्कों से भरी एक बड़ी थैली और सोने के सिक्कों से भरी एक छोटी थैली।

    हंसते हुए अमीर बोलेः "हा-हा-हा...! हम ने भी कैसी ज़ोर की हवस जगा दी है उसमें! मानना पड़ेगा तुम्हें भी मौलाना हुसैन, ऐसी आग तुम ने अक्सर नहीं देखी होगी। कैसी कांप रही थी उस की आवाज़, कैसे एक साथ वह हंस और रो रही थी! लेकिन उस नज़ारे के मुक़ाबले यह कुछ भी नहीं है जो तुम ख़्वाजा सरा के ओ’हदे पर पहुंचकर देखोगे।"

    दरबारियों की क़तारों में फुसफुसाहट फैल गयी। बख़्तियार काइयांपन से मुस्कराया। अब ख़ोजा नसरुद्दीन की समझ में आया कि उसे ख़्वाजा-सरा बनाने की सलाह किसने दी थी। अमीर बोलेः "अब उस की तबीअ’त सम्भल गयी है और तुम्हें नया ओ’हदा संभालने में देर नहीं करना चाहिए, मौलाना हुसैन। तुम अभी हकीम के साथ जाओ! अरे तुम..." वह हकीम की तरफ़ मुख़ातिब हुए, "जाओ, और अप ने चाक़ू ले आओ। बख़्तियार, तुम वह हुक्म लिख कर मेरे पास लाओ।"

    गर्म चाय से ख़ोजा नसरुद्दीन का हल्क़ जल गया और वह खांसने लगा। लिखा हुआ हुक्म लेकर बख़्तियार आगे बढ़ा। ख़ुशी और बदले की तमन्ना से उस का दिल बांसों उछल रहा था। अमीर को क़लम दिया गया। हुक्म पर उन्होंने दस्तख़त किये और हुक्मनामा बख़्तियार को लौटा दिया।इस पूरे वाक़िए में एक मिनट से भी कम वक़्त लगा होगा।

    "ऐ दाना आ'लिम, मौलाना हुसैन साहब! ख़ुशी की इन्तिहा से शायद आप बोल भी नहीं रहे! तो भी, अदब की मांग है कि आप शुक्रिया अदा करें!" बख़्तियार बोला।

    ख़ोजा नसरुद्दीन तख़्त के सामने झुक गया।

    "आख़िर मेरी तमन्ना बर आयी।" वह बोला। "अमीर की दाश्ता के लिए दवा तैयार करने में जो देर होगी, सिर्फ़ उसका ग़म मुझे है। उसके इलाज के बाबत पूरी तस्कीन होनी चाहिए, नहीं तो बीमारी फिर घर कर जायगी।"

    "क्या दवा बनने में इतनी देर लगेगी?" परेशानी से बख़्तियार ने सवाल किया। "आध घंटे में तो दवा ज़रूर तैयार हो जायगी…"

    "बिल्कुल ठीक! आधा घंटा काफ़ी होगा।" अमीर ने भी हामी भरी।

    अब अपना सब से आख़िरी, लेकिन सबसे ज़ियादा कारगर, हरबा इस्तेमाल करता हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः

    "ऐ आक़ा-ए-नामदार! यह तो सितारे साद-अल-ज़बीह पर मुनहसिर है। उसकी जगह के मुताबिक़ दवा तैयार करने में मुझे दो से पांच दिन तक लग सकते है।"

    "पांच दिन?" बख़्तियार चिल्ला उठा। "मैलाना हुसैन! दवा तैयार होने में पांच दिन लगते तो मैं ने कभी नहीं सुने।"

    अमीर को मुख़ातिब कर ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहाः "अमीर-ए-आज़म शायद उस नयी दाश्ता का इलाज आइन्दा वज़ीर बख़्तियार से कराना पसन्द करें। वह कोशिश करें तो शायद उसे चंगा भी कर दें। लेकिन उस हालत में उसकी ज़िन्दगी की ज़िम्मेदारी मैं नहीं लूंगा।"

    घबराकर अमीर बोलेः "क्या कहा, मौलाना हुसैन? तुम कह क्या रहे हो? बख़्तियार तो दवादारू के बारे में कुछ भी नहीं जानता। ही वह इतना होशियार है। माबदौलत यह बात तुम्हें पहले भी बता चुके हैं- जब तुम्हें वज़ीर-ए-आज़म का ओ’हदा देने की बात कही थी। वज़ीर-ए-आज़म बख़्तियार को कंपकंपी गयी। ज़हर बुझी नज़रों से उसने ख़ोजा नसरुद्दीन को देखा।

    अमीर बोलेः "जाओ और दवा तैयार करो, मौलाना हुसैन! लेकिन पांच दिन बहुत होते है। क्या तुम इस से कम वक़्त में दवा तैयार नहीं कर सकते? हम चाहते हैं कि अपने नये ओहदे को तुम जल्द से जल्द संभाल लो।"

    "ऐ शहंशाह-ए-आज़म! मैं तो उस ओ’हदे के लिए ख़ुद ही उतावला हूं। मैं ख़ुद ही जल्द से जल्द दवा तैयार करने की कोशिश करूंगा।"

    कोर्निश करता, उलटे पैरों चलता, ख़ोजा नसरुद्दीन दरबार से लौट चला। बख़्तियार उसे देखता रहा। उसकी शक्ल से ज़ाहिर था कि अपने दुश्मन और रक़ीब के बख़ैरियत लौट जाने से वह कितना कुढ़ रहा है।

    उधर, ग़ुस्से से दांत किटकिटाता हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन कह रहा थाः "बख़्तियार! सांप के बच्चे! दग़ाबाज़ लकड़बग्घे! तेरा दांव ख़ाली गया। अब तू मुझे नुक़सान नहीं पहुंचा सकेगा, क्योंकि मैं जो कुछ जानना चाहता था, जान गया हूं। अमीर के हरम में जाने के रास्ते, दरवाज़े और वापसी के रास्ते मुझे मा’लूम हो चुके है। और तू, मेरी दिलबर गुलजान! कम्बख़्त शाही हकीम के नश्तर से ख़ोजा नसरुद्दीन को बचाने के लिए तू ऐ’न मौक़े पर बीमार पड़ी। सचमुच तू बहुत अक़्लमन्द है- हालांकि ईमानदारी की बात यह है कि तू सोच सिर्फ़ अपनी बाबत रही थी!"

    वह मीनार की तरफ़ वापस लौटा। मीनार के नीचे साये में पहरेदार पांसे फेंक रहे थे। उन में से एक सब-कुछ हार चुका था। दांव पर लगाने के लिए अब वह अपने जूते उतार रहा था। दिन गर्म था। लेकिन मीनार की मोटी दीवारों के भीतर नम और ताज़ी ठंडक थी। ख़ोजा नसरुद्दीन ने तंग सीढ़ियों को पार किया। अपने कमरे के दरवाजे पर पहुंचा, लेकिन वहां से आगे बढ़कर ऊपर बग़दाद के आ’लिम के कमरे में चला गया।

    बूढ़े की शक्ल इस वक़्त वहशियाना हो रही थी। क़ैद में रहते-रहते उस की दाढ़ी और बाल बढ़ गये थे। घनी भवों के नीचे आंखें चमक रही थीं।

    ख़ोजा नसरुद्दीन पर उस ने गालियों की बौछार शुरू कर दीः "अबे हरामज़ादे! तू यहां मुझे कब तक बन्द रखेगा? ख़ुदा करे तेरे सर पर पत्थर गिरें और तलवों से निकले। बद-मआ’श! दग़ाबाज! फ़रेबी! तूने मेरा नाम, मेरी पोशाक, मेरा साफ़ा, मेरा पटका चुरा लिया! तेरे बदन में कीड़े पड़ें! तेरा जिगर और पेट सड़ जाय!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ऐसी बौछार का आ’दी हो चुका था। उस ने बुरा माना।

    "क़िबला मौलाना हुसैन! आपके लिए आज मैं ने एक नयी सज़ा तज्वीज़ की है। रस्सी के फन्दे में लकड़ी बांधकर आपका सिर दबाया जायगा। पहरेदार नीचे बैठे हैं। आपको इतनी ज़ोर से चींख़ना चाहिए कि वे सुन ले।"

    बूढ़ा सीख़चेवाली खिड़की के पास गया और वहां से एक सांस में चिल्लान लगाः

    "या अल्लाह! मुझे कितनी तकलीफ़ है! हाय, हाय! मेरा सर दबाओ! रस्सी के फ़न्दे से सर दबाओ! मर गया! ऐसी तकलीफ़ से तो मौत भली!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने बीच में ही टोकाः "ठहरिए, मौलाना हुसैन! रुकिए! देखिए, आप चिल्लाने में भी काहिली बरतते हैं। आपकी चींख़ से यक़ीन नहीं होता कि सचमुच आप का सर बेरहमी से दबाया जा रहा है। याद रखिए, पहरेदार ऐसे मुआमलों में बड़े तजर्बेकार है। अगर उन्हें शक हो गया कि आप बनावटी चींख़-पुकार मचा रहे हैं तो अर्सलां बेग को ख़बर दे देंगे और तब आप किसी असली जल्लाद के हाथों में पड़ जायेगे। चिल्लाने में ज़ोर लगाना तो आप के ही फ़ायदे की बात है। देखिए, मैं बताता हूं कैसे चींख़ना चाहिए?"

    वह खिड़की के पास गया, सांस भरी और यकायक इतने ज़ोर से चींख़ा कि बूढ़ा कान बन्द कर के पीछे को हट गया।

    शिकायती लहजे में वह बोलाः "अबे, काफ़िर की औलाद! मैं ऐसा गला कहां से लाऊं? आख़िर, मैं इस तरह कैसे चिल्लाऊं कि आवाज़ शहर के दूसरे कोने तक पहुंच जाय?"

    "असली जल्लादों के हाथ नहीं पड़ना चाहते, तो यही एक सूरत है।" ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहा। बूढ़े ने फिर कोशिश की और पूरा ज़ोर लगा दिया। अब वह इतनी दर्दभरी आवाज़ में चिल्ला रहा था कि मीनार के नीचे बैठे पहरेदारों ने जुआ रोक दिया और उसकी तकलीफ़ का मज़ा लेने लगे।

    चींख़ने की कोशिश में बूढ़े को खांसी गयी और गला घरघराने लगा। रिरियाता हुआ वह बोलाः

    "हाय, हाय! हाय मेरा गला! उफ़ मरा! हाय कितना ज़ोर पड़ा है इस पर! अबे नाक़िस आवारे! अब तो तू ख़ुश है? इज़राईल (मौत का फ़रिश्ता) तुझे उठा ले!"

    "हां, अब मुझे इत्मिनान हुआ।" ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया। "मौलाना हुसैन! अपनी इस कोशिश के लिए यह इनआ’म लीजिए।"

    अमीर से मिली थैलियां निकाल कर उसने उन्हें एक कश्ती में उंडेला और दो बराबर-बराबर हिस्सों में बाट दिया। बूढ़ा बैठा कोसता और गाली देता रहा।

    ख़ोजा नसरुद्दीन नर्मी से बोलाः "आप मुझे इस तरह गाली क्यों देते हैं? मौलाना हुसैन के नाम में क्या मैं ने किसी तरह का बट्टा लगाया है? क्या मैं ने उनके इल्म को बदनाम किया है? आप यह रक़म देख रहे है? अमीर ने यह रक़म मशहूर नजूमी और हकीम मौलाना हुसैन की अपने हरम की एक लड़की का इ’लाज करने के लिए दी है।"

    "लड़की का इ’लाज किया था तूने?" बूढ़े का गला रुंध गया। "जाहिल! बद-मआ’श! ठग! बीमारियों के बारे में तू जानता ही क्या है?"

    "मैं बीमारियों के बारे में तो कुछ नहीं जानता," ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दिया, "लेकिन लड़कियों के बारे में ज़रूर बहुत कुछ जानता हूं। सो, मुनासिब यही है कि अमीर से मिला यह इनआ’म दो हिस्सों में बांट दिया जाय- एक हिस्सा आपका हो जायगा, आपके इल्म का, एख हिस्सा मेरा हो, मेरे इल्म का। मैं आप को बता दूं, मौलाना साहब, कि मैं ने इस लड़की को यूं ही अच्छा नहीं कर दिया, बल्कि सितारों की कैफ़ियत समझाकर अच्छा किया है। कल रात मैं ने देखा कि सितारे

    सादअस्सऊद सितारे साद्-अल अक़बिया के क़ेरान (यो) में थे और अक़रब (वृश्चिक) सरतान की तरफ़ मुख़ातिब था।"

    ग़ुस्से से बौखला कर कमरे में इधर-उधर दौड़ता हुआ बूढ़ा चिल्लायाः "क्या कहा, जाहिल? तू सिर्फ़ गधे हांकने के क़ाबिल है! तू यह भी नहीं जानता कि सितारे साद-अस्सऊद सितारे साद्-अल अक़बिया के क़ेरान में जा ही नहीं सकते। वे एक ही क़ेरान के सितारे तो हैं। अक़रब का बुर्ज तुझे इस महीने में दिखायी ही कैसे दे गया? कल सारी रात मैं ने आसमान देखने में गुज़ारी। सितारे साद्-बुला और अस्सिमक क़ेरान में थे और अल-ज़वह उतार पर। सुन रहा है तू, काठ के उल्लू! अक़रब इस वक़्त है ही नहीं! तू सब गड़बड़ कर देता है। देखो तो, इस गधे हांकनेवाले ने उन मुआमलों में भी दख़ल देना शुरू कर दिया जिन का इसे कोई इल्म नहीं! सितारे अल्-बुतैन को, जो अल्-हक़ के मुख़ालिफ़ है, तू अक़रब समझ बैठा?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन की जहालत को नुमाया करने के इरादे से बूढ़ा देर तक उसे सितारों की सही कैफ़ियत समझाता रहा। ख़ोजा नसरुद्दीन हर लफ़्ज़ को ज़ेहन बैठाने में लगा था, ताकि आलिमों के सामने अमीर से बात करते वक़्त वह ग़लतियां कर बैठे।

    "जाहिल! जाहिल की औलाद! तेरी सात पुश्तें जाहिल है!" बूढ़ा नाराज़ी में बकता रहा, "तू यह भी नहीं जानता कि आज-कल, यानी चांद की उन्नीसवीं मंज़िल में, जो अश्-शुला कहलाती है, और जो क़ौस (धनु) के बुर्ज में है, इंसान की क़िस्मत इसी बुर्ज के सितारों के मातहत होती है और किसी के नहीं। आ’ला दानिशमन्द शहाबुद्दीन महमूद अलक़राज़ी ने अपनी किताब में यह बात बहुत साफ़-साफ़ लिख दी है…"

    ख़ोजा नसरुद्दीन याद करता गयाः "शहाबुद्दीन महमूद अलक़राज़ी... कल मैं अमीर की मौजूदगी में लम्बी दाढ़ीवाले आलिम का, इस किताब की बाबत जानने पर, पर्दाफ़ाश करूंगा। उसके दिल और दिमाग़ में मेरे इल्म के लिए बहुत इज़्ज़त और ख़ौफ़ छा जायगा। यह बहुत मुनासिब बात होगी।

    ।। 4 ।।

    सूदख़ोर-जाफ़र के मकान में सोने के भरे, मुहरबन्द, बारह मर्तबान थे। लेकिन उसकी हवस थी कि कम से कम बीस मर्तबान हों। तक़दीर से उसे शक्ल ऐसी मिली थी कि उसकी बेईमानी और उसका लालच उसकी शक्ल पर साफ़ झलक आते थे। जो लोग ग़ैर-तजरबेकार, सीधे-सादे और भलेमानस थे, वे भी उससे ख़बरदार रहते थे। उसके लिए नये शिकार फांसना बहुत मुश्किल था। इसीलिए, उसके मर्तबान बहुत धीमी रफ़्तार से भर रहे थे।लम्बी सांस लेकर वह सोचताः "काश! मैं अपने जिस्म के बदनुमापन से नजात पा जाता। तब लोग मुझे देख कर भागने लगते। मेरी चालबाज़ी भांपे बिना वे मेरा भरोसा कर लेते। ओह, तब उन्हें फंसाना कितना आसान होता! कितनी जल्दी मेरी आमदनी बढ़ती!"

    शहर में जब यह अफ़वाह फैली कि अमीर के नये आलिम मौलाना हुसैन ने इलाज में बड़े हुनर दिखाये हैं, तो सूदख़ोर जाफ़र ने बहुत उम्दा सौग़ातों से एक टोकरी भरी और महल जा पहुंचा। टोकरी का सामान देख कर अर्सलां बेग ने मदद करने की पूरी रज़ामन्दी ज़ाहिर की।

    "क़िबला जाफ़र साहब! तुम बहुत ठीक मौक़े पर आये। हमारे आक़ा शहंशाह का मिज़ाज आज बहुत अच्छा है। वह तुम्हारी दरख़्वास्त ज़रूर मान लेंगे।"

    अमीर ने सूद-ख़ोर की बात सुनी, सोने की हाथीदांत-जड़ी शतरंज में भेट क़ुबूल की और नये आलिम मौलाना हुसैन को बुला भेजा।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने आकर कोर्निश की। अमीर बोलेः "मौलाना हुसैन! यह शख़्स सूद-ख़ोर जाफ़र है। यह हमारा वफ़ादार ग़ुलाम है और इसने हमारी कई ख़िदमतें की हैं। हम हुक्म देते हैं कि तुम फ़ौरन इसका लंगड़ापन, कूबड़पन, कानापन वदूसरे नक़्सों को दूर कर दो।…"

    यह हुक्म सुन कर अमीर फ़ौरन चल दिये- मानो यह दिखाने के लिए कि इस हुक्म के ख़िलाफ़ वह कोई बात सुनने को तैयार नहीं। सर झुका कर ख़ोजा नसरुद्दीन ने आदाब बजाया और वह भी चल दिया। उस के पीछे-पीछे अपना कूबड़ घसीटता हुआ सूद-ख़ोर भी कछुए की तरह चलने लगा। "हे हज़रत मौलाना हुसैन साहब! हम लोग ज़रा जल्दी चले," नक़ली दाढ़ीवाले ख़ोजा नसरुद्दीन को पहचानकर सूद-ख़ोर बोला, "क्योंकि अभी सूरज नहीं ढला है और मैं रात होने से पहले ठीक हो जाऊंगा...। जैसा कि आपने सुना, अमीर ने आपको हुक्म दिया है कि आप मुझे फ़ौरन चंगा कर दें।"

    दिल ही दिल में ख़ोजा नसरुद्दीन अमीर को, सूद-ख़ोर को अपने-आपको बुला-भला कह रहा था कि क्यों उस के इल्म का इतना चर्चा हुआ और ऐसी शोहरत मिली। इस मुश्किल से कैसे छुटकारा मिलेगा? जल्दी चलने के लिए सूद-ख़ोर बार-बार आस्तीनें समेट रहा था।

    सड़कें सुनसान थी। ख़ोजा नसरुद्दीन के पांव बार-बार गर्म रेत में धंस जाते थे। आगे बढ़ता हुआ वह सोच रहा थाः

    "उफ़, कैसे इस मुश्किल से छुटकारा पाऊं?"

    एकाएक वह रुक गयाः "लगता है मेरी क़सम पूरी होने का वक़्त गया है।"

    फ़ौरन उस ने एक चाल सोची और हर पहलू से उसे ठोंक बजाकर देखा। मन ही मन उस ने कहाः "हां, वक़्त गया है!

    ग़रीबों को सतानेवाले बेरहम सूद-ख़ोर! तू आज ही डूबकर मरेगा।"

    वह दूसरी तरफ़ ताकने लगा ताकि सूद-ख़ोर उसकी काली आंखों की चमक देख सके। वे लोग अब एक गली में मुड़े जहां हवा रेत के बगूले उठा रही थी। सूद-ख़ोर ने अपने घर का चोर दरवाज़ा खोला। सहन के दूसरे सिरे पर एक नीची बाड़ के पीछे, जहां से जनानख़ाना शुरु होता था, ख़ोजा नसरुद्दीन ने हरे पत्तों और शाखों के पीछे हलकी आवाज़ हंसी सुनी और कुछ हिलते हुए देखा। सूद-ख़ोर की बीवियां और रखैलें नये अजनबी की आमद का मज़ा ले रही थी। वे ख़ुशी की उमंगों में थीं, क्योंकि अपनी क़ैद में मन बहलाने का उनके पास दूसरा तरीक़ा था नहीं। सूद-ख़ोर रुक गया और उन लोगों की तरफ़ घूरकर देखा। ख़ामोशी छा गयी।ख़ोजा नसरुद्दीन ने मन ही मन कहाः "ऐ हसीन क़ैदियो! मैं आज तुम्हें नजात दिला दूंगा।"

    जिस कमरे में सूद-ख़ोर ख़ोजा नसरुद्दीन को ले गया, उस में एक भी खिड़की नहीं थी और दरवाज़े में तीन ताले और कई सांकले लगी हुई थी, जिन्हें खोलने का राज़ सिर्फ़ सूद-ख़ोर को ही मा’लूम था। उसे काफ़ी देर मेहनत करनी पड़ी, तब कहीं जाकर दरवाज़ा खुला। यहीं वह अपने सोने से अटे मर्तबान रख़ता थी। तहख़ाने के दरवाज़े पर लगे तख़्तों पर ही वह सोता था।

    "कपड़े उतारो!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने हुक्म दिया।

    सूद-ख़ोर ने कपड़े उतार दिया। नंगा होकर वह बेहद भद्दा और बदनुमा लगता था। ख़ोजा नसरुद्दीन ने दरवाज़ा बन्द किया और दुआएं पढ़नी शुरु की।

    इसी बीच जाफ़र के बेशुमार रिश्तेदार आ-आकर सहन में इकट्ठे होने लगे। उन में से कई पर जाफ़र का क़र्ज़ था। वे उमीद कर रहे थे कि इस मुबारक मौक़े की यादगार में वह इन क़र्ज़ों को मुआ’फ़ कर देगा। लेकिन उनकी उमीदें ग़लत थीं। बन्द कमरे के बाहर अपने क़र्ज़दारों की आवाज़ेँ सुनकर शैतान जाफ़र ख़ुशी से फूल उठा।

    उस ने सोचाः "और मैं इन लोगों से कह दूंगा कि मैंने क़र्ज़र्ज मुआ’फ़ किया, लेकिन रसीदें इन्हें वापस नहीं करूंगा। चकमे में आकर ये लोग क़र्ज़र्ज चुकाने में लापरवाही बरतने लगेंगे। मैं कुछ कहूंगा नहीं। बस, चुपचाप क़र्ज़र्ज का हिसाब रखूंगा।

    और जब एक-एक तंके पर दस-दस तंके सूद हो जायगा और कुल रक़म उनके मकानों, बाग़ीचों और अंगूर के बाग़ों की क़ीमत से ज़ियादा हो जायगी, तो मैं क़ाज़ी को बुलाऊंगा और अपना वा’दा भूल जाऊंगा। रसीदें पेश कर दूंगा, उन की जायदादें बेच लूंगा, फिर उन्हें फ़क़ीर बना दूंगा और अपना एक और मर्तबान सोने से भर लूंगा!"

    ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः "चलो जाफ़र! अब हम लोग तुरखान के पाक तालाब चलेंगे, जहां तुम पाक पानी में नहाओगे। इलाज के लिए यह निहायत ज़रुरी है।"

    "तुरख़ान के पाक तालाब?" सूद-ख़ोर बदहवासी से चिल्ला उठा। "एक मर्तबा मैं उस में डूबते-डूबते बचा। दाना मौलाना हुसैन! आप को मा’लूम हो कि मैं तैरना नहीं जानता।"

    "कोई बात नहीं! तालाब जाते वक़्त तुम्हें बराबर दुआएं पढ़नी होंगी और दुनियावी चीज़ों से बिल्कुल बेख़बर हो जाना होगा। साथ में तुम्हें सोने के सिक्कों से भरी एक थैली भी ले चलनी होगी ताकि रास्ते में जो भी मिले उसे तुम एक-एक सिक्का दे सको।"

    सूद-ख़ोर ने सर्द आह भरी और कराहा। लेकिन उसने लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ हुक्म की ता’मील की। रास्ते में उन दोनों को कारीमर, भिखमंगे, हर क़िस्म के लोग मिले। हालांकि ऐसा करने में उसका दिल टूट रहा था तो भी हर एक को सूद-ख़ोर ने सोने का एक-एक सिक्का दिया। रिश्तेदार पीछे-पीछे रहे थे। ख़ोजा नसरुद्दीन ने जान-बूझकर उन लोगों को साथ ले लिया था ताकि सूद-ख़ोर को डूबो देने की तोहमत उस पर लगे।

    सूरज छतों के पीछे छिप रहा था। दरख़्तों का साया तालाब पर पड़ रहा था। मच्छर हवा में भनभना रहे थे। जाफ़र ने कपड़े उतारे और पानी की तरफ़ बढ़ा। शिकायती लहजे में वह बोलाः "पानी यहां बहुत गहरा है, मौलाना हुसैन! आप भूले तो नहीं- मैं तैरना नहीं जानता।"

    रिश्तेदार ख़ामोश खड़े देख रहे थे। शर्म से अपने हाथों से अपना जिस्म छिपाता हुआ, डर से दुबकता हुआ सूदख़ोर, तालाब के चारों तरफ़ कोई छिछली जगह ढूंढ रहा था। एक जगह वह बैठ गया। ऊपर से लटकती टहनियों को थामकर, डरते-डरते, अपने एक पैर का पंजा उसने पानी में डाला।

    "बाबा रे! यह तो बहुत ठंडा है!" वह बड़बड़ाया। घबराहट के मारे उस की आंखे बाहर निकली पड़ रही थी।

    नज़र बचाते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः "तुम वक़्त ख़राब कर रहे हो, जाफ़र।" वह अपना दिल कड़ा कर रहा था ताकि ग़लत मौक़े पर रहम उस पर हावी हो जाय। उसने उन सब लोगों की तकलीफ़ों के बारे में सोचना शुरु कर किया,

    जिन्हें जाफ़र ने बर्बाद कर दिया था। बीमार बच्चे के सूखे होंठ...बूढ़े नियाज़ के आंसू…!

    उसका चेहरा ग़ुस्से से तमतमा उठा।

    "तुम वक़्त ख़राब कर रहे हो जी!" उसने दोहराया। "अगर तुम्हें इलाज कराना है तो पानी में उतरो।"

    सूद-ख़ोर पानी में बढ़ने लगा। वह इतने आहिस्ता आहिस्ता बढ़ रहा था कि पानी जब उसके घुटनों तक पहुंचा, तो उसका पेट किनारे पर ही था। आख़िर वह पानी में खड़ा हुआ। पानी उसकी कमर तक पहुंच गया। घास और करकुल पानी में हिले। ठंडे पत्ते उसका बदन छूने लगे, जिस से उसे गुदगुदी महसूस हुई। ठंड से जाफ़र के कंधे कांपने लगे। उस ने एक क़दम और आगे बढ़ाया और मुड़ कर पीछे देखा। उसकी आंखे, गूंगे जानवर की तरह, रहम मांग रही थी। लेकिन, ख़ोजा नसरुद्दीन की आंखों में इस का जवाब नहीं था। सूद-ख़ोर पर रहम करने और उसे छोड़ देने का मतलब था, हज़ारों गरीब इंसानों पर और ज़ियादा मुसीबत ढाना।

    पानी सूद-ख़ोर के कूबड़ तक पहुंचा। लेकिन ख़ोजा नसरुद्दीन आगे बढ़ने के लिए उसे बेरहमी से ललकारता रहाः "आगे बढ़ो... और आगे बढ़ो! पानी कानों तक पहुंचने दो भाई! मैं बताये देता हूं, आगे नहीं बढ़ोगे तो मैं तुम्हारे इलाज की ज़िम्मेदारी नहीं लूंगा। हां, हां, शाबाश! आगे बढ़ो! किबला जाफ़र साहब , ज़रा-सी हिम्मत दिखाओ! हिम्मत करो, हिम्मत! एक क़दम और! ज़रा और आगे!"

    सूद-ख़ोर के मुंह में ग़लग़ल की आवाज़ आयी और वह पानी की सतह के नीचे ग़ायब हो गया।

    रिश्तेदार चिल्लाने लगेः "डूब रहा है! अरे वह डूब रहा है।"

    हड़बड़ी मच गयी। दरख़्तों की शाखें और झाड़ियां डूबते हुए जाफ़र की तरफ़ बढ़ायी जाने लगी। कुछ लोग सिर्फ़ रहमदिल होने की वजह से उसे बचाना चाहते थे, कुछ लोग बचाने का महज़ बहाना कर रहे थे। ख़ोजा नसरुद्दीन उन्हें देख कर ही आसानी से बता सकता था कि उनमें किस पर जाफ़र का कितना क़र्ज़ है। वह ख़ुद औरों से ज़ियादा दौड़-दौड़कर चिल्ला रहा था और शोर मचा रहा थाः "यहां, इधर! जाफ़र साहब! अपना हाथ हमें दीजिए! सुनिए न! ज़रा अपना हाथ इधर बढ़ाइए!"

    उसे इस बात का पूरा यक़ीन था कि सूद-ख़ोर अपना हाथ नहीं बढ़ायेगा! दीजिए, का लफ़्ज़ सुन कर ही उसे लक़वा मार मार जाता था।

    सभी रिश्तेदार एक साथ चिल्लाएः "दीजिए! अपना हाथ इधर दीजिए!"

    सूद-ख़ोर डूबता और फिर ऊपर आता, हर बार ऊपर आने में उसे पहली बार से ज़ियादा देर लगती। सचमुच उस पाक तालाब में उसकी ज़िन्दगी ख़त्म हो गयी होती, अगर तभी ख़ाली मशक पीठ पर लादे, नंगे पैर भागता हुआ एक भिश्ती वहां पहुंचता।

    डूबते हुए को देख कर वह चौं ककर बोलाः "अरे, यह तो सूद-ख़ोर जाफ़र है!"

    बिना झिझक, पूरी पोशाक पहने हुए ही वह पानी में कूद पड़ा और हाथ बढ़ाकर चिल्लायाः "यह लो! मेरा हाथ पकड़ लो!"

    सूद-ख़ोर ने हाथ थाम लिया और हिफ़ाज़त के साथ बाहर निकल आया।

    उधर सूद-ख़ोर किनारे पर पड़ा होश-हवास दुरुस्त कर रहा था, इधर भिश्ती जोश के साथ उस के रिश्तेदारों को बता रहा थाः

    "तुम लोग ग़लत तरीके से उस की मदद कर रहे थे। बराबर 'लीजिए' 'लीजिए' की जगह 'दीजिए' 'दीजिए' चिल्ला रहे थे।

    क्या तुम्हें मा’लूम नहीं कि एक मर्तबा पहले भी जाफ़र साहब इसी तालाब में क़रीब-क़रीब डूब चुके थे और एक अजनबी ने उन्हें बचाया था जो इधर से एक गधे पर सवार होकर गुज़र रहा था? उस अजनबी ने भी जाफ़र को बचाने की यही तरकीब की थी और यह तरकीब मुझे याद थी। आज वह जानकारी काम गयी।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने सुना तो अपना होंठ काट लिया। तो उस ने दो बार सूद-ख़ोर को बचाया था? एक बार ख़ुद अपने हाथों से और अब भिश्ती के ज़रिए? वह सोचने लगाः "ख़ैर, कोई बात नहीं। यह डूब कर रहेगा, यह मेरा ज़िम्मा है- चाहे इसके लिए मुझे साल भर बुख़ारा में क्यों रहना पड़े।"

    अब तक सूद-ख़ोर के दम में दम गया था और वह शिकायत के लहजे में कराह-कराहकर कहने लगाः "अरे मौलाना हुसैन! तुम ने तो कहा था कि तुम मेरा इलाज करोगे! लेकिन तुमने तो मुझे डुबा ही दिया था। अल्लाह गवाह है। मैं क़सम खाता हूं कि इस तालाब के सौ क़दम क़रीब भी कभी नहीं आऊंगा! तुम हो किस तरह के आ’लिम जो डूबते हुए शख़्स को कैसे बचाना चाहिए, यह भी नहीं जानते। यह बात तुम्हें एक मा’मूली भिश्ती से सीखनी पड़ी? लाओ मेरा साफ़ा

    और ख़िलअ’त। चलो मौलाना! अंधेरा हो रहा है और हमें वह काम पूरा करना है जो हम ने शुरू किया था। और तुम, भिश्ती," खड़े होते हुए सूद-ख़ोर बोला, "हफ़्ते भर बाद तुम्हें मेरा क़र्ज़र्ज चुकाना है, यह मत भूलना। लेकिन मैं तुम्हें कुछ इनआ’म देना चाहता हूं और इसलिए मैं तुम्हारा आधा... मेरा मतलब है चौथाई... यानी तुम्हारे क़र्ज़ा का दसवां हिस्सा मुआ’फ़ कर दूंगा। यह काफ़ी है, हालांकि तुम्हारी मदद के बिना भी मैं आसानी से अपने को बचा सकता था।"

    भिश्ती सहमकर बोलाः "अरे जाफ़र साहब! आप मेरी मदद के बिना नहीं बच सकते थे। क्या आप मेरे क़र्ज़ का एक चौथाई भी मुआ’फ़ नहीं कर सकते?

    "आ-हा! तो तू ने मुझे ख़ुदग़रज़ी से बचाया था?" सूद-ख़ोर चिल्लाया। "तू नेक मुसलमान के जज़्बे से नहीं बल्कि लालच से मुझे बचाने आया था? इस बात की तो तुझे सज़ा मिलनी चाहिए! अबे भिश्ती! मैं क़र्ज़ की एक पाई भी मुआ’फ़ नहीं करूंगा।"

    झेंपा और सहमा हुआ भिश्ती आगे बढ़ चला। ख़ोजा नसरुद्दीन रहम से उस की देखता रहा। फिर वह घूमा और नफ़रत और हिक़ारत की नज़र से जाफ़र को देखा और भिश्ती की तरफ़ बढ़ गया।

    जाफ़र ने जल्दबाज़ी मचायीः "चलो, मौलाना हुसैन! तुम्हें उस लालची भिश्ती के कान में फुसफुसाने को क्या मिल गया?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहाः "ठहरो! तुम यह भूल गये हो कि जिस किसी से भी तुम मिलो, उसे सोने का एक सिक्का दोगे।

    भिश्ती को तुमने अभी तक सिक्का क्यों नहीं दिया?"

    सूद-ख़ोर रिरियाने लगाः "ला’नत है मुझ पर! उफ़, मैं तो बिल्कुल बर्बाद हो जाऊंगा! ज़रा सोचो तो, मुझे इस लालची और नाचीज़ भिश्ती तक को सोने का सिक्का देना पड़ेगा?"

    उसने थैली खोली और एक सिक्का निकाल कर फेंकाः "बस, यह आख़िरी मर्तबा है। अब अंधेरा हो गया और वापसी में रास्ते में हमे कोई नहीं मिलेगा।"

    लेकिन भिश्ती से फुसफुसाकर ख़ोजा नसरुद्दीन ने बेकार ही बातें नहीं की थीं।

    वे वापस रवाना हुए। आगे-आगे सूद-ख़ोर, उसके पीछे ख़ोजा नसरुद्दीन था। सब से पीछे रिश्तेदार चल रहे थे। अभी वे लोग पचास क़दम भी चले होंगे कि एक गली से वही भिश्ती फिर निकला- हां, वही जिसे इन लोगों ने अभी तालाब के किनारे छोड़ा था।

    उसे नज़रअंदाज़ करने की ग़रज़ से सूद-ख़ोर मुड़ा, लेकिन ख़ोजा नसरुद्दीन ने डांटाः "जाफ़र साहब, याद रखो! हरेक को, जो तुम्हें मिले!"

    अंधेरे में तकलीफ़ भरी कराह सुनायी पड़ी। जाफ़र थैली खोल रहा था। कोई पचास क़दम चले होंगे कि वह फिर उनके सामने खड़ा हुआ। सूद-ख़ोर पीला पड़ गया और कांपने लगा। बहुत आजिज़ी से वह बोलाः

    "मौलाना, यह तो फिर वही..."

    बेरहमी से ख़ोजा नसरुद्दीन ने जवाब दियाः "जो भी मिले, हरेक को।"

    एक बार फिर एक कराह रात की बन्द हवा में उभरी। जाफ़र थैली खोल रहा था।

    यही हरकत सारे रास्ते होती रही। हर पचास क़दम बाद वही भिश्ती खड़ा होता। जाफ़र हांफ रहा था। पसीना चेहरे से टपक रहा था। वह समझ ही नहीं पा रहा था कि यह हो क्या रहा है। सिक्का थामकर वह सीधा भागता कि आगे सड़क पर झाड़ियों के पीछे से जाने कहां से निकल कर वही भिश्ती फिर सामने खड़ा होता।

    अपनी रक़म बचाने के लिए सूद-ख़ोर ने जल्दी-जल्दी चलना शुरू किया और फिर एकदम दौड़ने लगा। लेकिन वह लंगड़ा था और उस भिश्ती से कैसे टक्कर ले सकता था जो अपनी उमंग में हवा से बातें कर रहा था और बाड़ों चहारदीवारियों को फांद रहा था। सूद-ख़ोर को वह रास्ते में कम से कम पन्द्रह बार मिला। सूद-ख़ोर के घर के बिल्कुल नज़दीक आख़िरी बार वह एक छत से कूदकर सामने गया और फाटक में घुसने का रास्ता रोक लिया। आख़िरी सिक्का पाकर बेदम होकर वह वहीं ज़मीन पर गिर पड़ा।

    सूद-ख़ोर घर के सहन में पहुंचा। ख़ोजा नसरुद्दीन उसके पीछे-पीछे था। जाफ़र ने अपनी ख़ाली थैली नसरुद्दीन के क़दमों पर फेंक दी और ग़ुस्से से चिल्लायाः "मौलाना हुसैन साहब! मेरा इलाज बहुत महंगा पड़ रहा है! मैं अब तक सौग़ात,ख़ैरात और इस मलऊन भिश्ती पर तीन हज़ार तंके से ज़ियादा ख़र्च कर चुका हूं।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने कहाः "इत्मिनान रखो, भाई! आधे घंटे के भीतर ही तुम इस का इनआ’म पाओगे। सहन के बीच ख़ूब बड़ी आग जलाने को कहो।"

    इधर नौकर ईंधन ला रहे थे और आग जला रहे थे, उधर ख़ोजा नसरुद्दीन तेज़ी से कोई ऐसी चाल खोज निकालने के लिए दिमाग़ दौड़ा रहा था जिससे सूद-ख़ोर मात खा जाय और इलाज ने हो पाने की ज़िम्मेदारी उसी पर पड़े। उस ने कई तरकीबें सोचीं। लेकिन हर एक को नामुनासिब समझ कर तर्क कर दिया। इस बीच आग ख़ूब भड़क उठीं थी और हलकी हवा पाकर लपटें ऊंची उठ रही थीं जिस से पास के अंगूर के बाग़ीचे की हरियाली पर लाल रोशनी फैल रही थी।

    ख़ोजा नसरुद्दीन बोलाः "जाफ़र साहब! कपड़े उतारिए और आग के तीन चक्कर लगाइए!"

    कोई ठीक चाल उसकी समझ में अब तक नहीं आयी थी और वह सिर्फ़ वक़्त काट रहा था। वह ख़याल में डूब रहा लग रहा था। रिश्तेदार ख़ामोशी से देख रहे थे। सूद-ख़ोर आग के चारों तरफ़ घूम रहा था, मानो जंज़ीर से बंधा कोई बनमानुस हाथ हिलाता नाच रहा हो, उस के हाथ क़रीब-क़रीब घुटनों तक पहुंचते थे।

    ख़ोजा नसरुद्दीन का चेहरा खिल उठा। उसने आराम की सांस ली और कन्धे चौड़ाये। फिर वह बोलाः "मुझे एक कम्बल दो! जाफ़र और तुम सब लोग यहां आओ!"

    रिश्तेदारों को उस ने एक गोल घेरे में खड़ा किया और बीच में ज़मीन पर सूद-ख़ोर को बैठाया। फिर उस ने उन सब लोगों को मुख़ातिब करके कहाः "मैं जाफ़र को इस कम्बल में ढंग दूंगा और दुआ पढूंगा। तुम सब लोग, और जाफ़र भी, आंखे बन्द करके मेरे साथ दुआ दोहराना। जब मैं कम्बल हटाऊंगा, तो जाफ़र का इलाज पूरा हो चुकेगा। लेकिन एक बहुत ज़रुरी शर्त है। अगर यह शर्त पूरी हुई, तो जाफ़र का इलाज नहीं हो सकेगा। तुम लोग कान लगाकर सुनो कि मैं क्या कहता हूं।"

    रिश्तेदार उस के हर लफ़्ज़ को ध्यान से सुनते और उसे याद रखने के लिए ख़ामोश हो गये और पास खड़े हुए।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ज़ोरदार और साफ़ आवाज़ में कहने लगाः "मेरे बाद जब तुम दुआ के लफ़्ज़ दोहराओ, तो तुम में से कोई भी बन्दर के बारे में- कम से कम जाफ़र तो हरगिज़ ही- नहीं सोचे! अगर तुम में से किसी ने बन्दर के बारे में सोचा- या इस से भी बदतर, कोई अपने ख़याल में भी उसे लाया- उस की दुम, लाल पिछाड़ी, बदनुमा चेहरा और पीले दांत देखे, तो इलाज नहीं हो सकेगा। ऐसे में इलाज हो भी नहीं सकता क्योंकि किसी भी पाक काम में बन्दर जैसे गन्दे और नापाक जानवर का ख़याल ठीक नहीं। तुम लोग समझ रहे हो न?"

    "हम लोग समझ रहे हैं।" रिश्तेदारों ने जवाब दिया।

    कम्बल से सूद-ख़ोर को ढंकते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने बड़ी संजीदा आवाज़ में कहाः "जाफ़र साहब! तैयार हो जाइए और अपनी आंखे बन्द कर लीजिए।" फिर रिश्तेदारों की तरफ़ पलटकर वह बोलाः "अब तुम लोग भी अपनी आंखे बन्दर कर लो और मेरी शर्त याद रखो। ख़बरदार! बन्दर के बारे में बिल्कुल ही सोचना।"

    फिर उसने दुआ पढ़नी शुरू कीः "ऐ रब्बुल आलमीन दाना-ए-पाक आलिफ़, लाम, मीम (क़ुरआन की एक आयत के पहले लफ़्ज़) की ख़ुसूसियत से इस अपने हक़ीर ग़ुलाम जाफ़र को अच्छा कर दे…"

    रिश्तेदार भी बेमेल आवाज़ में दुआ दोहराने लगेः "ऐ रब्बुल आलमीन दाना-ए-पाक..." यहां ख़ोजा नसरुद्दीन ने एक चेहरे पर कुछ परेशानी और घबराहट देखी। एक दूसरा रिश्तेदार खांसने लगा। तीसरा दुआ के लफ़्ज़ों पर अटक गया।

    चौथे ने सिर हिलाया, मानो आंखों के सामने से कोई नज़ारा हटा रहा हो।

    एक लम्हे के बाद ही कम्बल के नीचे जाफ़र ख़ुद बेचैनी से हिलने लगा। बेहद नफ़रत पैदा करनेवाला, बहुत बदनुमा, एक बन्दर अपनी लम्बी दुम और पीले दांत दिखाता उसके दिमाग़ के पर्दे पर खड़ा हुआ था और कभी जीभ दिखाकर और कभी अपनी लाल गोल पिछाड़ी और बदन के वे हिस्से दिखा कर चिढ़ाने लगा जो ऐसे वक़्त किसी भी सच्चे मुसलमान के ख़याल में आने के क़ाबिल नहीं।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ज़ोरदार आवाज़ में दुआ करता रहा। याकयक वह रुक गया, मानो कुछ सुन रहा हो। रिश्तेदार ख़ामोश हो गये। कुछ तो पीछे को हट गये।

    कम्बल के नीचे जाफ़र दांत किटकिटा रहा था क्योंकि उस के ख़यालात में बन्दर बिल्कुल खुले तौर पर गन्दी हरकतें करने लगा था।

    "काफ़िरो! शरारत पसन्दो!" ख़ोजा नसरुद्दीन गरज उठा। "मैं ने जो बात मनअ' की थी, उसे करने की मज़ाल? उस चीज़ का ख़याल करते हुए तुम लोग दुआ कैसे कर सके जिसकी मैं ने ख़ास तौर पर मुमानअ’त की थी?"

    कम्बल फुर्ती से हटाते हुए वह सूद-ख़ोर की तरफ़ झपटाः "तू ने मेरी मदद क्यों मांगी थी? अब मैं समझ गया कि तू इलाज करवाना ही नहीं चाहता था। तू तो सिर्फ़ मुझे ज़लील करना चाहता था। तू मेरे दुश्मनों का साथ दे रहा था! जाफ़र, होशियार! कल अमीर को सारा माज़रा मा’लूम हो चुकेगा। मैं उन्हें बताऊंगा कि किस तरह दुआ मांगते वक़्त तू ने जान बूझकर-काफ़िराना इरादे से- बन्दर के बारे में सोचा! और तुम सब लोग भी होशियार हो जाओ! तुम लोग आसानी से छुटकारा नहीं पाओगे। कुफ़्र की जो सज़ा होती है वह तुम लोग जानते होगे…"

    चूंकि कुफ़्र के लिए हमेशा बहुत सख़्त सज़ा मिलती थी, इसलिए रिश्तेदार मिमियाने-रिरियाने लगे। वे डरे हुए थे। जाफ़र ने घिघियाकर समझ में आनेवाले लफ़्ज़ों में अपनी सफ़ाई पेश करनी चाही। लेकिन उसे सुनने के लिए ख़ोजा नसरुद्दीन रुका नहीं। वह घूमा और खटाक से फाटक बन्द करता बाहर निकल गया।

    थोड़ी देर में चांद निकल आया। सारा शहर हलकी चांदनी में नहा गया। रात को देर तक सूद-ख़ोर के घर शोरग़ुल होता रहा, तकरार होती रही। हर शख़्स ज़ोर-ज़ोर से बहस कर रहा था और यह जानने की कोशिश कर रहा था कि बन्दर की बाबत सोचनेवाला पहला शख़्स कौन था।

    ।। 5 ।।

    सूद-ख़ोर को बे-वक़ूफ़ बनाकर ख़ोजा नसरुद्दीन महल को वापस लौटा।

    दिन भर की मेहनत के बाद बुख़ारा के बाशिन्दे सोने की तैयारी कर रहे थे। गलियां ठंड़ी और अंधेरी थीं। पुलों के नीचे से पानी के बहने की आवाज़ रही थी। हवा में नम धरती की सोंधी महत थी। कहीं-कहीं कीचड़ में ऐसी जगह ख़ोजा नसरुद्दीन का पैर फिसल जाता जहां किसी जोशीले भिश्ती ने सड़कों पर ज़रूरत से ज़ियादा छिड़काव कर दिया था, ताकि रात में हवा का झोंका उन थके-मांदे लोगों की नींद में ख़लल डाले जो छतों पर और इहातों में आराम करने के लिए लेट गये थे। अंधेरे में डूबे हुए, बाग़ीचे दीवारों के ऊपर से ख़ुश्बू फैला रहे थे। दूर चमकते सितारे ख़ोजा नसरुद्दीन को कामयाबी का यक़ीन दिला रहे थे।

    वह हंसाः "आख़िर दुनिया इतनी बुरी जगह नहीं है- कम-से-कम एक ऐसे आदमी के लिए तो क़तई बुरी नहीं- जिस के पास दिमाग़ हैं और जिस के कन्धों पर ख़ाली घड़ा नहीं है।"

    वापसी में वह बाज़ार की तरफ़ मुड़ गया। वहां उसे अपने दोस्त अली के चायख़ाने की रोशनी दिखायी दी।

    मालिक ने उसके लिए दरवाज़े खोल दिया। दोनो गले मिले और एक अंधेरे कमरे में चले गये। पतली दीवार के दूसरी तरफ़ से बोलने, हंसने और चीनी के बरतनों के खड़कने की आवाज़ रही थी। अली ने दरवाज़े बन्द कर दिया और चराग़ जलाया।

    "सब चीजें तैयार है।" अली ने फुसफुसाया। "मैं गुलजान के लिए चायख़ाने में इंतिज़ार करूंगा। युसूफ लुहार ने गुलजान को हिफ़ाज़त से छिपाने के लिए एक अच्छी सोच रखी है। तुम्हारे गधे पर दिन-रात ज़ीन कसी रहती है। वह मज़े में है। ख़ूब खाता है और बहुत मोटा हो गया है।"

    "शुक्रिया, अली! मैं नहीं जानता कि मैं कभी तुम्हारी नेकी का बदला चुका सकूंगा।"

    अली बोलाः "हां, हां! ख़ोजा नसरुद्दीन! हमें शुक्रियों के बारे में और बहस नहीं करनी चाहिए। क्या तुम थोड़ी-सी चाय पियोगे?"

    वह बाहर गया और थोड़ी देर बाद चाय लेकर वापस लौट आया।

    दोनों धीरे-धीरे बातें करने लगे। अली ने गुलजान के लिए मर्दों की ख़िलअ’त और उस के बालों की लटों को ढकने के लिए एक बड़ी और सफ़ेद पगड़ी निकाली।

    हर चीज़ तफ़्सील से तय हो गयी। ख़ोजा नसरुद्दीन जाने ही वाला था कि उसे दीवार की दूसरी तरफ़ से एक पहचानी हुई आवाज़ सुनाई दी। चायख़ाने की तरफ़ खुलनेवाला दरवाज़े उसने ज़रा-सा खोला और कान खड़े कर लिए। यह आवाज़ थी चेचकरू जासूस की।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने दरवाज़े की दरार बड़ी की ओर झांका।

    क़ीमती ख़िलअ’त पहने, पगड़ी और नक़ली दाढ़ी लगाये, चेचकरू ख़ुफ़िया चन्द आदमियों से घिरा बैठा था और ग़ुस्से में कह रहा थाः

    "यहां जो आदमी ख़ोजा नसरुद्दीन के नाम से घूमता-फिरता है वह जालिया है।असली ख़ोजा नसरुद्दीन मैं हूं दोस्तो !

    लेकिन काफ़ी अर्सा हुआ मैं ने अपनी ग़लतियों से तौबा कर ली है, क्योंकि मैं ने समझ लिया है कि मेरी ग़लतियां कितनी ख़राब और नापाक है। इसलिए मैं, असली ख़ोजा नसरुद्दीन, तुम को नसीहत करता हूं कि मेरी मिसाल के नक़्श-ए-क़दम पर चलो और मरी तरह कहो कि हमारा अज़ीम, सानी-ए-आफ़ताब अमीर वाक़ई इस दुनिया में अल्लाह का नायब है। इस का सबूत उसकी बेमिसाल ज़हानत, मेहरबानी और दानाई है। मैं, असली ख़ोजा नसरुद्दीन, तुम को यही सलहा देता हूं।"

    "ओ हो!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने धीरे से कहा और अली को कोहनी मारी। "अच्छा? चूंकि उनका यह ख़याल है कि मैं ने यह शहर छोड़ दिया है, इसलिए इनके ये इरादे हैं। मुझे इन लोगों को अपनी याद दिलानी पड़ेगी। अली, मैं अपनी दाढ़ी, ज़र-बफ़्त की ख़िलअ’त और अ'मामा यहीं छोड़ दूंगा। मुझे कुछ फटे-पुराने कपड़े दो।"

    अली ने उसे एक फटी-पुरानी और दीमक खायी ख़िलअ’त दी जिस की ज़िन्दगी पूरी हो चुकी थी।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने वह पोशाक पहनते हुए कहाः "क्या तुम पिस्सू पैदा करते हो भाई? ज़रूर तुम्हारा इरादा पिस्सू हलाल कर के बेचने का है। लेकिन मेरे दोस्त, इस से पहले ही वे तुम्हें चट कर जायेंगे।

    वह गली में चला गया। चायख़ाने का मालिक अपने गाहकों के पास लौट आया और अब होने वाले वाक़िआत का इंतिज़ार करने लगा। उसे बहुत देर इंतिज़ार नहीं करना पड़ा। ख़ोजा नसरुद्दीन एक गली से आता हुआ दिखायी दिया। वह एक ऐसे आदमी की तरह पैर घसीट रहा था जिस ने दिन भर सफ़र किया हो। उसने चायख़ाने की सीढ़ियां पार कीं, एक अंधेरे कोने में जा कर बैठ गया और चाय मांगी। किसी ने उसकी तरफ़ ध्यान किया। बुख़ारा की सड़कों पर सभी तरह के मुसाफ़िर आते-जाते थे।

    चेचकरू खुफ़िया कह रहा थाः "मेरी ग़लियातं बेशुमार थीं। लेकिन मैं, ख़ोजा नसरुद्दीन, अब उन ग़लतियों पर शर्मिन्दा हूं। मैं ने हमेशा नेक रहने, इस्लाम पर चलने और अमीर, उन के वज़ीर, हाकिमों और सिपाहियों का हुक्म मानने का फ़ैसला किया है। जब से मैं ने फ़ैसला किया, मुझे चैन और ख़ुशी हासिल हुई है और मेरी दुनियाबी दौलत बढ़ गयी है। पहले मैं एक ऐसा आवारा था, जिस से लोग नफ़रत करते थे। लेकिन अब मैं एक दीनदार मुसलमान की हैसियत से ज़िन्दगी बसर करता हूं।"

    एक गाड़ीवान ने, जो कमर में चाबुक खोंसे था, बहुत इज़्ज़त से उस के सामने चाय का एक प्याला पेश किया और कहाः "ऐ बेमिसाल ख़ोजा नसरुद्दीन! मैं कोक़न्द से बुख़ारा आया हूं। मैं ने आपके इल्म की बहुत तारीफ़ सुनी है। लेकिन मैं ने यह कभी सोचा था कि मुलाक़ात तो दरकिनार, एक दिन मुझे आप से बातचीत का मौक़ा भी मिलेगा। अब मैं हरेक से इस मुलाक़ात का ज़िक्र करूंगा और आप की नसीहत को दोहराऊंगा।"

    चेचकरू ख़ुफ़िया ने कहाः "बिल्कुल ठीक! हरेक को बताओ कि ख़ोजा नसरुद्दीन सुधर गया है, तौबा कर के दीनदार मुसलमान और अमीर-ए-आज़म का वफ़ादार ग़ुलाम बन गया है। जिस से भी मिलो, उसे यही ख़ुश-ख़बरी सुनाओ।"

    गाड़ीवान ने कहाः "ऐ लासानी ख़ोजा नसरुद्दीन! मुझे आप से एक सवाल पूछना है। मैं एक दीनदार मुसलमान हूं और कम अक़्ली की वजह से कोई ऐसी हरकत नहीं कर बैठना चाहता जो मज़हब के ख़िलाफ़ साबित हो। मैं यह जानना चाहता हूं कि अगर मैं नहा रहा होऊं और मोअज़्ज़िन की अज़ान सुन लूं तो किस तरफ़ मुडूं?"

    चेचकरू ख़ुफ़िया ने मेहरबानी से मुस्कराते हुए कहाः "बेशक, मक्का की तरफ़!"

    "अपने कपडों की तरफ़!" अंधेरे कोने से एक आवाज़ सुनायी दी। "घर तक नंगे जाने से बचने का यही सबसे अच्छा तरीक़ा है।"

    चेचकरू ख़ुफ़िया के बनावटी इज़्ज़त के माहौल के बावजूद लोगों ने मुस्कराहट छिपाने के लिए अपने मुंह फेर लिये।

    "कौन बड़बड़ा रहा है उस कोने में? भिखमंगे," ग़ुरूर से उसने पूछा, "क्या तू ख़ोजा नसरुद्दीन की क़ाबिलिय्यत से टक्कर लेने की कोशिश कर रहा है?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने चाय पीते हुए जवाब दियाः "उस के मुक़ाबले मैं बहुत नाचीज़ हूं।"

    इस के बाद किसान ने पूछाः "ऐ पाक ख़ोजा नसरुद्दीन! मुझे बताओ कि इस्लाम के मुताबिक़ मैयत में शरीक होते वक़्त सबसे अच्छी जगह कौन सी है- ताबूत के पीछे या आगे?"

    ख़ुफ़िया ने जवाब देने के लिए पुर असर अंदाज़ में उंगली उठायी ही थी कि कोने वाली आवाज़ उस से पहले ही बोल उठीः "अगर तुम ख़ुद ताबूत के अन्दर नहीं हो तो इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुम आगे हो या पीछे।"

    ज़रा सी बात में ही हंस पड़नेवाला चायख़ाने का मालिक दोनों हाथों से अपनी तोंद सम्हाले हुए क़हक़हा लगाने लगा। दूसरे लोग भी हंसी रोक सके। कोनेवाला आदमी हाज़िर जवाब था और मज़े से ख़ोजा नसरुद्दीन का मुक़ाबला कर रहा था।

    ख़ुफ़िया ने, जिस का ग़ुस्सा बराबर बढ़ रहा था, धीरे से अपना सिर घुमायाः "अबे, तेरा नाम क्या है? मैं तेरी ज़बांदराज़ी देख रहा हूं! याद रख कि कहीं तुझे अपनी जबान से बिल्कुल ही हाथ धोने पड़ें!"

    लोगों की तरफ़ मुड़ते हुए उस ने कहाः "मैं उसे एक ही तंजिया और चुभते हुए लफ़्ज़ से ख़ामोश कर सकता हूं। लेकिन फ़िलहाल हम पाक और संजीदा बातचीत कर रहे हैं, जहां तेज़ मौजूं नहीं। हर चीज़ का मौक़ा होता है, इसलिए इस वक़्त मैं भिखमंगे की छींटाकशी का जवाब नहीं दूंगा।...हां, तो मैं कह रहा था कि मैं, ख़ोजा नसरुद्दीन, तुम को सलाह देता हूं कि मुसलमानों, हाकिमों का हुक्म मानो और ख़ुशहाली तुम्हारे घरों में उतर आयेगी। लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि ख़ोजा नसरुद्दीन होने का झूठा दावा करनेवाले मशहूर आवारों की तरफ़ ध्यान दे। इसी क़िस्म के एक आवारे ने अभी हाल में गड़बड़ी मचायी थी और यह सुन कर कि मैं, असली ख़ोजा नसरुद्दीन गया हूं, गधे के सिर से सींग की तरह ग़ायब हो गया। ऐसे सब जा’लियों को पकड़ लो और उन्हें अमीर के सिपाहियों के हवाले करो।"

    "बिल्कुल दुरुस्त," बनावटी पोशाक फेंक कर ख़ोजा नसरुद्दीन साये से रोशनी में आकर बोला। सभी लोगों ने उसे पहचान लिया और उस के यकायक खड़े होने से तअ’ज्जुब में पड़ गये। जासूस पीला पड़ गया। ख़ोजा नसरुद्दीन उस के क़रीब गया। अ’ली चुपचाप उसके पीछे खड़ा हुआ।

    "तो, तुम ही असली ख़ोजा नसरुद्दीन?"

    ख़ुफ़िया ने घबड़ा कर चारों तरफ़ देखा। उस के होंठ कांप रहे थे। आंखें चारों तरफ़ कुछ ढूंढ रही थीं। उस ने जवाब देने के लिए हिम्मत बटोरीः

    "हां मैं ही सच्चा और असली ख़ोजा नसरुद्दीन हूं। बाक़ी सब जा’लिये हैं, जा’लिये। तुम भी जा’लिये हो।"

    "मुसलमानो! भाइयो! अब किस बात का इंतिज़ार है?" ख़ोजा नसरुद्दीन चिल्लाया। "इस ने ख़ुद क़ुबूल किया है! पकड़ लो इसे! क्या तुम ने अमीर का हुक्म नहीं सुना? क्या तुम नहीं जानते कि ख़ोजा नसरुद्दीन के साथ क्या सलूक करना चाहिए?

    पकड़ लो इसे, वर्ना तुम पर बहुत कड़ा इल्ज़ाम लगेगा।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने ख़ुफ़िया की नक़ली दाढ़ी उखाड़ फेंकी।

    चायख़ाने के सभी लोगों ने चेचकरू चेहरा, चपटी नाक- जिस से उन्हें नफ़रत थी- और मक्कार आंखें पहचान लीं।

    "इसने ख़ुद क़ुबूला है," ख़ोजा नसरुद्दीन ने दाहिनी तरफ़ आंख मारते हे कहा, "पकड़ लो इस ख़ोजा नसरुद्दीन को!" उस ने बायीं तरफ़ आंख मारी।

    चायख़ाने के मालिक अ’ली ने ही सब से पहले ख़ुफ़िया पर हाथ छोड़ा। ख़ुफ़िया ने अपने को छुड़ाने की बहुत कोशिश की, मगर भिश्ती, किसान और कारीगर सब हाथा-पायी करने लगे। थोड़ी देर तक तो वहां घूंसों के उठने-गिरने के अ’लावा और कुछ नज़र ही आता था। ख़ोजा नसरुद्दीन सब से ज़ियादा ज़ोर से हाथ चला रहा था।

    "य...य... यह तो मैं...म...ज़ाक कर रहा था," कराहता हुआ ख़ुफ़िया बोला। "ऐ मुसलमानों! मैं तो बस...म...ज़ाक कर रहा था। मैं ख़ोजा न...सरुद्दीन नहीं हूं! मुझे छोड़ दो!"

    "तुम झूठ बोलते हो," ख़ोजा नसरुद्दीन ने उसे डांटा। वह उसी तेज़ी से घूंसे चला रहा था, जिस तेज़ी से नानबाई आंटा गूंधता है। "तुम ने ख़ुद क़ुबूल किया है कि तुम ख़ोजा नसरुद्दीन हो। हम सब ने अभी-अभी सुना है। मुसलमानो! यहां पर मौजूद हम सब लोग अमीर के बे-इंतहा वफ़ादार है। वफ़ादारों के साथ हमें उन के हुक्म पर अ’मल करना चाहिए। इसलिए, सच्चे मुसलमानो, इस ख़ोजा नसरुद्दीन की अच्छी तरह मरम्मत करो। इसे महल तक घसीट ले जाओ और

    सिपाहियों के सुपुर्द कर दो। अल्लाह और अमीर के नाम पर इसे अच्छी तरह पीटो।"

    भीड़ ख़ुफ़िया को महल तक ले गयी। रास्ते भर लोग उसे ज़ोर-ज़ोर से पीटते रहे। ख़ुफ़िया की रवानगी के वक़्त ख़ोजा नसरुद्दीन ने उस के एक ठोकर मारी और चायख़ाने में लौट आया।

    "उफ्!" माथे का पसीना पोंछते हुए उसने कहा, "हम ने उस की ऐसी मरम्मत की है कि ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगा। मा’लूम पड़ता है अब भी उसकी ठुकाई हो रही है।"

    दूर से ज़ोर की आवाज़ें और ख़ुफ़िया की चींख़ें सुनायी पड़ रही थीं। हर एक को उस से कुछ कुछ बदला लेना था। अमीर के हुक्म की बदौलत उन्हें इस का अच्छा मौक़ा भी मिल गया था।

    ख़ुशी से हंसता हुआ चायख़ाने का मालिक अपना तोंद थपथपा रहा थाः "यह अच्छा सबक़ मिला बच्चू को। अब वह दोबारा मेरे चायख़ाने में क़दम रखने की हिम्मत नहीं करेगा।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने पीछे वाले कमरे में कपड़े बदले, नक़ली दाढ़ी लगायी और एक बार फिर बग़दाद का आलिम मौलाना हुसैन बन गया।

    वह महल में वापस पहुंचा तो महल की हवालात से कराहने की आवाजें सुनायी दीं। उसने अन्दर झांक कर देखा। सूजा हुआ और ज़ख़्मी बदन लिये चेचकरू ख़ुफ़िया नमदे पर पड़ा था। लालटेन लिये अर्सलां बेग उसके पास खड़ा था। ख़ोजा नसरुद्दीन ने बड़ी मा’सूमियत से पूछाः "क़िबला अर्सलां बेग! क्या मा’मला है भाई।"

    "बड़ी बुरी ख़बर है, मौलाना हुसैन! बद-मआ’श ख़ोजा नसरुद्दीन फिर शहर में लौट आया है। हमारे सबसे होशियार जासूस को उसने पीट डाला है। यह जासूस उस बद-मआ’श के बदअसर को दूर करने के लिए मेरे हुक्म से अपने को ख़ोजा नसरुद्दीन बताकर वफ़ादारी की और मज़हबी बातें करता था। नतीजा आपके सामने हैं।"

    "ओह! ओह!" ख़ुफ़िया अपना ज़ख़्मी चेहरा ऊपर को उठाता हुआ कराहा। "अब कभी उस दोज़ख़ी आवारे के मुआ’मले में नहीं पडूंगा। अगली दफ़ा तो वह मुझे मार ही डालेगा। मैं अब ख़ुफ़ियागिरी नहीं करूंगा। कल ही मैं यहां से बहुत दूर चला जाऊंगा- जहां मुझे कोई जानता हो। वहां मैं कोई भली-सी नौकरी कर लूंगा।"

    "मेरे दोस्तों ने वाक़ई ढंग से काम पूरा किया है," लालटेन की रोशनी में ख़ुफ़िया की हालत देखते हुए और उसके लिए थोड़ा सा अफ़्सोस ज़ाहिर करते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने मन ही मन सोचा। "अगर महल दो सौ क़दम और दूर होता तो यह यहां तक ज़िन्दा पहुंचता। अब देखना यह है कि इस ने सबक़ सीखा है या नहीं।"

    सुब्ह का वक़्त था। ख़ोजा नसरुद्दीन ने खिड़की से चेचकरू ख़ुफ़िया को एक छोटी-सी गठरी लेकर बाहर निकलते देखा। वह लंगड़ा रहा था और बराबर अपनी छाती, कंधों और बग़लों पर हाथ फेर रहा था। बीच-बीच में दम लेने के लिए वह बैठ भी जाता था। सबेरे की पहली किरनों से रौशन बाज़ार को उस ने पार किया और दीवारों के साये में ग़ायब हो गया।

    सुब्ह की किरनों से रात का अंधेरा भाग गया था। शबनम से धुली, चमकदार, साफ़ और पुरअम्न सुब्ह थी। चिड़ियां चहचहा रही थीं, गा रही थीं और तरह-तरह की सुरीली आवाजें निकाल रही थीं। तितलियां सूरज की पहली किरनों का मज़ा लूटने के लिए इधर से उधर उड़ रही थीं। ख़ोजा नसरुद्दीन के सामने खिड़की पर एक मक्खी बैठी और अलमारी में एक मर्तबान में रखे हुए शहद की महक पाकर उसे तलाश करने लगी।

    सूरज ख़ोजा नसरुद्दीन का पुराना और वफ़ादार दोस्ता था। वह अब निकल रहा था। हर सुब्ह उनकी मुलाक़ात होती और हर सुब्ह ख़ोजा नसरुद्दीन को ऐसा मज़ा आता, गोया उसने साल भर से सूरज को देखा हो। सूरज उभर रहा था- एक ऐसा नेक और सख़ी देवता जो सब पर एक-सा मेहरबान है। और, सुब्ह की धूप में चमकती हुई दुनिया अपना हुस्न निखार कर उसका इस्तिक़बाल करती है। उड़ते हुए ऊन जैसे बादल, मीनारों की चमकती हुई ईंटें, नयी पतियां, पानी, घास,

    धूल- यहां तक कि क़ुदरत की बेरूख़ी के शिकार, उस के सौतेले बच्चे, बेरौनक़ पत्थरों, में भी सूरज के इस्तिक़बाल के लिए एक अ’जीब हुस्न निखर आता। पत्थरों के खुरदरे किनारे इस तरह चमकने लगते गोया उन पर जवाहरात की कनी छिनक दी गयी हो।

    अपने दोस्त के मुस्कराते चेहरे को देख कर ख़ोजा नसरुद्दीन कैसे उदास रह सकता था? चमकती किरनों में एक दरख़्त जगमगा उठा और उसके साथ ही ख़ोजा नसरुद्दीन भी जगमगा उठा- गोया वह ख़ुद भी हरियाली में लिपटा हुआ हो। सबसे नज़दीकी मीनार पर कबूतर ग़ुटर-ग़ू-ग़ुटर-ग़ू कर रहे थे और अपने पर चोंचों से संवार रहे थे। ख़ोजा नसरुद्दीन की भी तबियत हो रही थी कि वह अपने पर संवारे। खिड़की के सामने तितलियों का एक जोड़ा उड़ रहा था, ख़ोजा नसरुद्दीन की तबियत हो रही थी कि वह भी एक तीसरी तितली बन कर उनके इस हसीन खेल में शामिल हो जाय।

    ख़ोजा नसरुद्दीन की आंखे ख़ुशी से चमक रही थीं। चेचकरू ख़ुफ़िया के बारे में उसने सोचा: काश! आज की यह ख़ास सुब्ह उसकी नयी, साफ़ और अच्छी ज़िन्दगी का सबेरा बन सके। लेकिन जैसे ही उसने यह सोचा, उसे अफ़्सोस के साथ ख़याल आया कि उस आदमी की रूह में बहुत ज़ियादा बदकारियां जमा’ हो गयी हैं जिन की तौबा मुश्किल थी, जैसे ही वह पूरी तरह ठीक होगा वह अपनी पुरानी बदकारियां फिर शुरू कर देगा।

    बाद के वाक़िआत ने साबित कर दिया कि ख़ोजा नसरुद्दीन का ख़याल ग़लत नहीं था। वह आदमियों को इतनी अच्छी तरह पहचानता था कि ग़लती करना उसके लिए मुश्किल था, हालांकि अगर उसका ख़याल ग़लत निकलता तो उसे ख़ुशी ही होती और वह ख़ुफ़िया की नयी रूहानी ज़िन्दगी का इस्तिक़बाल करता। लेकिन जो चीज़ सड़ जाती है, वह दोबारा ताज़ा नहीं हो सकती, खिल सकती है, बदबू ख़ुशबू में नहीं बदल सकती। अफ़्सोस करते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने एक आह भरी। उस के ख़यालात की दुनिया ऐसी थी कि जहां इंसान भाई-भाई की तरह रहें, जहां लालच, हसद, दग़ा और ग़ुस्से का नाम हो, जहां सब एक-दूसरे की वक़्त पर मदद करें और एक-दूसरे की ख़ुशी में शामिल हों। मगर इस क़िस्म के हसीन ख़यालों में डूबे हुए उसे यह कड़वी सचाई नज़र आयी कि इंसान को, जैसे वह रहता है, नहीं रहना चाहिए- यानी दूसरों पर जब्र करते हुए और दूसरों को ग़ुलाम बनाते हुए। वे अपनी रूह को बदनुमा बनाते जा रहे थे। पाक और ईमानदार ज़िन्दगी के उसूलों को समझने में इंसानों को आख़िर कितना वक़्त लगेगा?

    ख़ोजा नसरुद्दीन को इस बात में शक नहीं था कि एक दिन लोग इन उसूलों को समझेंगे। उसे पूरा यक़ीन था कि दुनिया में बुरे लोगों के क़ाबिलिय्यत अच्छे लोगों की ता’दाद ज़ियादा है। सूद-ख़ोर जाफ़र और चेचकरू ख़ुफ़िया और उनकी ज़लील रूहें महज़ ऐसी नापाक और गंदी मिसालें थी जो आ’म नहीं है। उसे पूरा यक़ीन था कि क़ुदरत ने आदमी में नेकी भरी है और उस की सारी बदी वह ज़हर है जिसे ज़िन्दगी के ग़लत और बेजा निज़ाम ने बाहर से उस की रूह में भरा है। उसे पूरी

    उमीद थी कि वह वक़्त भी आयेगा जब इंसान अपनी ज़िन्दगी के निज़ाम को बदलेगा और उसे बेहतर बनाएगा- ईमानदारी की मेहनत से अपनी रूहों को पाक बनायेगा।

    ख़ोजा नसरुद्दीन के ख़यालायात इसी क़िस्म के थे। यह बात उसके बारे में उन कहानियों से साबित होती हैं, जिन पर उस के दिल की छाप है। हालांकि उस की याद को नीचता भरी जलन औऱ बदगुमानी से सियाह करने की कोशिशें की गयीं, लेकिन समें कामयाबी मिली क्योंकि झूठ कभी सच्चाई पर फ़तह नहीं पा सकता।

    ख़ोजा नसरुद्दीन की याद हमेशा नेक और पाक रहेगी- उस हीरे के मानिंद जो हमेशा चमकता रहता है। आज भी तुर्की में जो मुसाफ़िर अक-शहीर में उसके मा’मूली से मज़ार के सामने रुकते हैं, उसकी बड़ाई करते हैं। एक शायर के अल्फ़ाज़ में वे कहते हैः

    "उसने अपना दिल ज़मीन को दे दिया, हालांकि ख़ुद आंधी की तरह वह सारी दुनिया का चक्कर लगाता रहा। वह एक ऐसी आंधी थी, जिस ने अपनी मौत के बाद अपने दिल में खिले सारे गुलाबों की ख़ुशबू को दुनिया में बिखेर दिया। सारी दुनिया की ख़ूबसूरती देखने में जो ज़िन्दगी गुज़रे, वह बहुत हसीन ज़िन्दगी है। और, हसीन है यह ज़िन्दगी जो ख़त्म होने पर अपनी रूह की पाकीज़गी छोड़ जाये।"

    यह सच है कि कुछ लोग कहते हैं कि अक-शहीर के मज़ार के अन्दर कोई नहीं है, कि ख़ोजा नसरुद्दीन ने अपनी मौत की अफ़वाह फैलाने के लिए इसे जान-बूझकर बनवाया था और ख़ुद सफ़र के लिए निकल पड़ा था। यह बात सच है या ग़लत? मैं समझता हूं, हमें इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। हम तो सिर्फ़ यह जानते हैं कि ख़ोजा नसरुद्दीन से कोई चीज़ दूर नहीं।

    ।। 6 ।।

    सुब्ह का वक़्त गुज़र गया। उमस-भरी दोपहरी शुरु हुई। अब सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था।

    भाग निकलने की तैयारी पूरी हो चुकी थी। ख़ोजा नसरुद्दीन अपने क़ैदी के पास पहुंचा और उससे कहाः

    "ऐ दानिशमन्द मौलाना हुसैन! आपकी क़ैद की मीआ’द पूरी हुई। आज रात मैं महल छोड़ दूंगा। एक शर्त पर मैं आप का दरवाज़ा खुला छोड़ जाऊंगाः आप यहां सो दो दिन और नहीं निकलें। अगर आप इस से जल्दी निकल पड़े, तो हो सकता है कि मैं उस वक़्त महल में ही मौजूद रहूं और तब मैं आप पर यह इल्ज़ाम लगाने को मजबूर हो जाऊंगा कि आप निकल भागना चाहते थे। तब मैं आप को जल्लाद के सुपुर्द कर दूंगा। इसलिए, बग़दाद के आलिम मौलाना हुसैन, अलविदा’अ! मेरे बारे में ज़ियादा बेरहमी से सोचना। एक काम और मैं आपके सुपुर्द करता हूं। वह यह है कि आप अमीर को मेरा असली और सही वाक़िआ बतायें। ज़रा ग़ौर से सुनिये मौलाना हुसैन! मेरा नाम है- ख़ोजा नसरुद्दीन।"

    "क-क-क्या...?" बूढ़ा घबड़ा कर पीछे को हटता हुआ अचम्भे से बोला। इस के आगे वह एक लफ़्ज़ भी बोल सका। इस नाम ने ही मानो उसे गूंगा बना दिया हो।

    दरवाज़े के बन्द होने की आवाज़ हुई। ज़ीने से उतरते ख़ोजा नसरुद्दीन के क़दमों की आवाज़ धीमी पड़ती सुनाई दी। बूढ़े ने आहिस्ते से दरवाज़े टटोला। दरवाज़ा खुला हुआ था। आलिम ने झांक कर बाहर देखा। कोई नहीं दिखाई दिया। उसने जल्दी से दरवाज़ा बन्द कर लिया और सांकल चढ़ा दी। वह बड़बड़ाने लगाः "नहीं, मुझे यहां एक हफ़्ते भले ही और रहना पड़े, लेकिन मैं ख़ोजा नसरुद्दीन से और सरोकार रखना पसन्द करूंगा।"

    रात होने पर नीले आसमान में जब पहले सितारे चमकने शुरु हुए, तभी ख़ोजा नसरुद्दीन ने मिट्टी की एक सुराही उठायी और अमीर के हरम के दरवाज़े पर तअ’ईनात पहरेदारों के पास पहुंचा।

    साबित अंडे निगलनेवाला मोटा और काहिल सिपाही कह रहा थाः "वह देखो! एक सितारा और टूटा। अगर, जैसा कि तुम कहते हो, सितारे टूटकर ज़मीन पर गिरते है, तो लोगों को पड़े हुए क्यों नहीं मिलते?"

    "शायद वे समुन्दर में गिर जाते हों!" दूसरे सिपाही ने जावब दिया।

    "ऐ बहादुर सिपाहियों!" ख़ोजा नसरुद्दीन ने टोका। "ख़्वाजा-सरा को बुलाओ। मैं बीमार दाश्ता के लिए दवा लाया हूं।"

    ख़्वाजा-सरा आया। बड़ी इज़्ज़त से उसने सुराही थामी। सुराही में खड़िया मिले सादे पानी के अलावा और कुछ नहीं था। दवा कैसे पी जाएगी इस बारे में ख़ोजा नसरुद्दीन ने उसे लम्बी हिदायत दी।

    "ऐ दानिशमन्द मौलाना हुसैन! आप दुनिया की सब बातें जानते हैं।" मोटे सिपाही ने चापलूसी भरी आवाज़ में कहा। "आप के इल्म की कोई हद नहीं। आप हमें बताइए कि आसमान से गिर कर सितारे कहां जाते हैं और लोगों को मिलते क्यों नहीं?"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने मज़ाक करने का मौक़ा नहीं छोडा। बहुत संजीदगी से बोलाः "तुम नहीं जानते? जब सितारे टूटते हैं तो वे चांदी के छोटे-छोटे सिक्के बन जाते हैं और फ़कीर लोग उन्हें बटोर लेते हैं। लोगों को मैं ने इसी तरह दौलतमन्द बनते देखा है।"

    सिपाहियों ने एक-दूसरे को ताका। उन के चेहरों पर तअ’ज्जुब की छाप थी।

    उनकी बे-वक़ूफ़ी पर हंसता हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन अपने रास्ते लगा। उसे ख़याल भी था कि उसका यह मज़ाक किसी वक़्त बहुत कारगार साबित होगा।

    आधी रात तक वह मीनार में रहा। आख़िरकार सारा शहर और महल ख़ामोशी में डूब गये। ज़ाया करने के लिए अब वक़्त नहीं था। गर्मी की रातें तेज़ परों पर उड़ती हैं। ख़ोजा नसरुद्दीन चुपचाप नीचे उतरा और चोरी-चोरी अमीर के हरम की तरफ़ बढ़ा।

    वह सोच रहा था कि पहरेदार अब तक नींद में ग़ाफ़िल हो चुके होंगे। लेकिन, वहां पहुंच कर उसे धीमे-धीमे बोलने की आवाज़ें सुनाई दीं। उसे बहुत नाउम्मीदी हुई।

    मोटा काहिल सिपाही कह रहा थाः "काश! एक सितार टूट कर यहां भी गिर जाता तो चांदी बटोर कर हम लोग रईस बन जाते।"

    उसके साथी ने जवाब दियाः "भई, मुझे तो यक़ीन नहीं होता कि सितारे टूटकर चांदी के सिक्के बन जाते हैं।"

    "लेकिन बग़दाद के आलिम ने तो यही कहा था।" पहले ने जवाब दिया।

    "बेशक! उनका इल्म गहरा है और वह ग़लत नहीं कह सकते।"

    साये में छिपते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन भुनभुनायाः "ख़ुदा की मार इन लोगों पर! मैं ने इन से सितारों की बात की ही क्यों? अब तो सबेरे तक यही तकरार रहेगी और भाग निकलने में देर हो जायगी!"

    बुख़ारा के ऊपर आसमान में साफ़ और हलकी रोशनी में हज़ारों सितारे चमक रहे थे। यकायक एक नन्हा-सा सितारा टूटा और आसमान में तिरछा-तिरछा अपनी मौत की मंज़िल पर बढ़ चला। जलती हुई लकीर-सी छोड़ता हुआ एक और सितारा उसके पीछे हो लिया। आधी गर्मियां ख़त्म हो चुकी थीं और सितारे टूटने का मौसम रहा था।

    "अगर ये सचमुच चांदी के सिक्के बनकर गिरते..." दूसरे पहरेदार ने कहा।

    यकायक ख़ोजा नसरुद्दीन के दिमग़ में एक ख़याल कौंध गया। झटपट उसने चांदी के सिक्कों से भरी अपनी थैली खोली।

    लेकिन देर तक कोई सितारा नहीं टूटा। आख़िर एक सितारा टूटा।

    तभी ऊंचे-नीचे पत्थरों पर एक सिक्का खनका। अचम्भे से पहरेदार मानो बुत बन गये। एक-दूसरे की तरफ़ घूरते वे उठ खड़े हुए।

    पहले ने कांपती आवाज़ में पूछाः "सुना तुमने?"

    "हां सुना त...तो!" दूसरा हकला कर बोला।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने दूसरा सिक्का फेंका। वह चांदनी के उजाले में गिरा और चमकने लगा। मोटा पहरेदार झपटकर उसके ऊपर लेट गया।

    दूसरा पहरेदार ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था। जोश के मारे उस की ज़बान से लफ़्ज़ नहीं फूट रहे थेः "क्या तु...तुम्हें व... वह मिला…?"

    "मि...मिल गया!" कांपते होठों से मोटा सिपाही हकलाया। उसने उठकर सिक्का दिखाया।

    यकायक मानों कई तारे एक साथ टूटकर तेज़ी से गिरे। ख़ोजा नसरुद्दीन मुट्ठी भर-भरकर सिक्के फेंकने लगा। रात का सन्नाटा सिक्कों की खनखनाहट से कांप रहा था। सिपाही अक़्ल खो बैठे। अपने नेज़े फेंककर, ज़मीन पर लोट-लोटकर, वे सिक्के ढूंढ़ने लगे।

    "यहां, यहां, यह रहा!" पहलेवाले ने फटी आवाज़ में कहा।

    दूसरा रेंगता हुआ चुपचाप आगे बढ़ा। यकायक उसे बहुत से सिक्के मिल गये। ख़ुशी से वह ग़लग़लाने लगा।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने एक मुट्ठी सिक्के और उछाले और चोर दरवाज़े से भीतर घुस गया। बाक़ी काम आसान था। पैरों की आहट मुलायम ईरानी क़ालीनों में खो गयी। मोड़ और रास्ते उसे याद थे। हिजड़े सो रहे थे।

    भरी मुहब्बत से गुलजान ने उसे प्यार किया और कांपती हुयी उस से लिपट गयी।

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने फुसफुसाकर कहाः "जल्दी करो।"

    किसी ने उनको रोका नहीं। एक हिजड़ा नींद में कुनमुनाया और कराहने लगा। ख़ोजा नसरुद्दीन उस पर झुका, लेकिन हिजड़े की मौत अभी नहीं आयी थी, उपने होंठ चटख़ारे और फिर ख़र्राटे भरने लगा।

    रंगीन शीशों से हलकी चांदनी छन रही थी।

    चोर दरवाज़े पर पहुंचकर ख़ोजा नसरुद्दीन ने होश्यारी से बाहर नज़र डाली। सहन के बीच घुटनों के बल बैठे अपनी-अपनी गर्दनें आगे बढ़ाये सिपाही आसमान की तरफ़ टकटकीं बांधे किसी सितारे के टूटने का इंतिज़ार कर रहे थे। ख़ोजा नसरुद्दीन ने एक मुट्ठी सिक्के और फेंके, जो दरख़्तों के दूसरी तरफ़ गिरे। उसकी खनखनाहट सुनकर जूते खटखटातें पहरेदार उधर ही दौड़ पडे। जोश में वे अपने आसपास नहीं देख रहे थे। भालुओं की तरह ज़ोर से हांफते और समझ में आनेवाली बातें बड़बड़ाते वे आगे बढ़ गये और उस कंटीली झाड़ी को पार कर गये जिस ने उनके कपड़े फाड़ दिये।

    एक की कौन कहे, उस रात सारी दाश्ताएं चुरायी जा सकती थीं।

    ख़ोजा नसरुद्दीन बराबर कह रहा थाः "जल्दी करो, करो!"

    दोनों दौड़कर मीनार तक पहुंचे और सीढ़ियां चढ़ गये। अपने बिस्तर के नीचे से ख़ोजा नसरुद्दीन ने एक रस्सा निकाला। यह तैयारी उसने पहले ही कर ली थी।

    गुलजान फुसफुसायीः "बहुत ऊंचाई है...मुझे डर......।"

    ख़ोजा नसरुद्दीन ने एक फंदा बनाया और उसमें गुलजान को बांधा। फिर खिड़की के सीख़चों को हटा दिया। इन्हें उसने पहले ही रेत डाला था। गुलजान खिड़की की मुंडेर पर जा बैठी। डर से वह कांप रही थी।

    उसकी पीठ को हलका सा धक्का देते हुए ख़ोजा नसरुद्दीन ने कड़ाई से कहाः "बाहर उतरो!"

    गुलजान ने आंखें मींच लीं और चिकने पत्थर से सरक कर हवा में झूलने लगी।

    ज़मीन पर पहुंचकर वह सम्भल गयी। तभी ऊपर से आवाज़ आयीः "भागो! भागो! भाग जाओ!"

    खिड़की पर झुका हुआ ख़ोजा नसरुद्दीन हाथ हिला रहा था और रस्सा ऊपर को खींच रहा था। गुलजान ने जल्दी से रस्सा खोला और सुनसान बाज़ार में ग़ायब हो गयी।

    ख़ोजा नसरुद्दीन को नहीं मा’लूम था कि पूरे महल में शोरग़ुल और कुहराम मच गया है। मार पड़ने के तकलीफ़देह तजरबे के बाद ख्वाजा सरा को बेवक़्त अपनी ज़िम्मेदारी का ख़याल आया और नयी दाश्ता के कमरे में जाकर आधी रात को झांका। उसका बिस्तर ख़ाली पाकर भागा-भागा वह अमीर के पास पहुंचा और उन्हें जगा दिया।

    अमीर ने अर्सलां बेग को बुलाया। अर्सलां बेग ने पहरेदारों को जगाया। फिर क्या था! मिशअलें जल उठीं, ढालें और नेज़े खड़कने लगे।

    बग़दाद के आलिम मौलाना हुसैन को बुला भेजा गया। ख़ोजा नसरुद्दीन हाज़िर हुआ।

    अमीर ने शिकायत करते हुए तेज़ आवाज़ में कहाः "मौलाना हुसैन! यह क्या हालत है? अमीर-ए-आज़म, माबदौलत, को अपने महल में भी बद-मआ’श ख़ोजा नसरुद्दीन से नजात नहीं? ऐसा तो कभी नहीं सुना गया था कि अमीर के हरम से दाश्ता चुरा ली जाय।"

    "ऐ अमीर-ए-आज़म!" बख़्तियार ने हिम्मत बटोरकर कहा। "यह भी मुमकिन है कि यह ख़ोजा नसरुद्दीन की करतूत हो?"

    "फिर कौन कर सकता है यह ?" फटी आवाज़ में अमी