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निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
फ़ारसी कलाम
जहान-ओ-अहल-ए-जहाँ रा ज़ ज़ात-ए-ऊ रौनक़नगीन-ए-ख़ातम-ए-आ'लम जनाब-ए-मुन'अम पाक
शाह मोहसिन दानापुरी
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सूफ़ी कहानी
तपते बयाबान में एक शैख़ का नमाज़ पढ़ना और अहल-ए-कारवाँ का हैरान रह जाना- दफ़्तर-ए-दोउम
एक चटयल मैदान में एक ज़ाहिद ख़ुदा की इ’बादत में मसरूफ़ था। मुख़्तलिफ़ शहरों से हाजियों
रूमी
ना'त-ओ-मनक़बत
जहान-ए-ख़ाक था महरूम साए से तेरे लेकिनरहा अहल-ए-जहाँ के सर पे साया तेरी रहमत का
सूफ़ी तबस्सुम
नज़्म
तल्बा से ख़िताब
बताओ अहल-ए-जहाँ को मआ'नी-ए-ग़म-ए-इ’श्क़हर इक दिल को ग़म ये दे के सोगवार करो
बर्क़ वारसी
ग़ज़ल
हम अहल-ए-इशक़ आसाँ इशक़ की मंज़िल समझते हैंना जब मुश्किल समझते थे ना अब मुश्किल समझते हैं
क़मर जलालवी
ना'त-ओ-मनक़बत
क़िब्ला-ए-अहल-ए-सफ़ा मालिक-ओ-मुख़्तार अ'लीऐ ज़हे सल्ले-अ'ला नाएब-ए-सरकार अ'ली
यादगार शाह वारसी
ना'त-ओ-मनक़बत
तमाम अहल-ए-जहाँ भर लें झोलियाँ अपनीबढ़ाएँ आप को जो दस्त-ए-करम ग़रीब-नवाज़
डाॅ. ज़ुहूरुल हसन शारिब
ना'त-ओ-मनक़बत
बाग़ जन्नत के हैं बहर-ए-मद्ह-ख़्वान-ए-अहल-ए-बैततुम को मुझ़दा नार का ऐ दुश्मनान-ए-अहल-ए-बैत
हसन रज़ा बरेलवी
सूफ़ी उद्धरण
अपनी ज़रूरत से पहले दूसरों की ज़रूरत का ध्यान रखना, यही अहल-ए-करम का तरीक़ा है।
अपनी ज़रूरत से पहले दूसरों की ज़रूरत का ध्यान रखना, यही अहल-ए-करम का तरीक़ा है।
शैख़ अहमद सरहिन्दी
ना'त-ओ-मनक़बत
मत्मह-ए-अहल-ए-विला है सूरत-ए-तेग़-ए-अ’लीक़ाबिल-ए-मदह-ओ-सना है सीरत-ए-तेग़-ए-अ’ली


