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पद
ख़ुद-बीं के तुम पास न बैठो वो हक़ से बेगाना है
ख़ुद-बीं के तुम पास न बैठो वो हक़ से बेगाना हैसोहबत उस की हर दाना को ग़म ग़ुस्से का खाना है
कवि दिलदार
शे'र
मेरे सीना पर तुम बैठो गला तलवार से काटोख़त-ए-तक़्दीर मैं समझूँ ख़त-ए-शमशीर-ए-बुर्राँ को
राक़िम देहलवी
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कलाम
ऐ शो’ला-ए-जवाला जब से लौ तुझ से लगाए बैठे हैंइक आग लगी है सीने में और सब से छुपाए बैठे हैं
कामिल शत्तारी
ग़ज़ल
जो याँ कुछ चाहने वाले क़रीब-ए-यक-दिगर बैठेहम अपना दिल बग़ल में दाब लेकर आह कर बैठे
ख़्वाजा मीर दर्द
शे'र
हमारे दिल को बहर-ए-ग़म की क्या ताक़त जो ले बैठेवो कश्ती डूब कब सकती है जिस के नाख़ुदा तुम हो
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
तिरे कूचे में क्यूँ बैठे फ़क़त इस वास्ते बैठेकि जब उट्ठेंगे इस दुनिया से जन्नत ले के उट्ठेंगे
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
वो बना रहे हैं बे-ख़ुद मुझे सामने बिठा केकभी जाम से पिला के कभी आँख से पिला के
अनवर फ़र्रूख़ाबादी
ना'त-ओ-मनक़बत
मुफ़्लिस-ए-वक़्त को सुल्तान किए बैठे हैंसारे आ'लम पे वो एहसान किए बैठे हैं