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शे'र
मेहर-ए-ख़ूबाँ ख़ाना-अफ़रोज़-ए-दिल-अफ़सुर्दः हैशो'ला आब-ए-ज़ि़ंदगानी-ए-चराग़-ए-मुर्दः है
मीर मोहम्मद बेदार
ग़ज़ल
मेहर-ए-ख़ूबाँ ख़ाना-अफ़रोज़-ए-दिल-अफ़सुर्दः हैशो'ला आब-ए-ज़ि़ंदगानी-ए-चराग़-ए-मुर्दः है
मीर मोहम्मद बेदार
ग़ज़ल
वो हू-हक़ अब कहाँ अफ़्सुर्दा है मय-ख़ाना बरसों सेनहीं क़ाएम हुई है मज्लिस रिंदाना बरसों से
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
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विषय
दिल
दिल
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ग़ज़ल
ये क्या है तिरे होते अफ़्सुर्दा है मय-ख़ानाहाँ ऐ दिल-ए-दीवाना इक ना'रा-ए-मस्ताना
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
ग़ज़ल
बेदम शाह वारसी
कलाम
जो अहल-ए-दिल हैं वो हर दिल को अपना दिल समझते हैंमक़ाम-ए-'इश्क़ में हर गाम को मंज़िल समझते हैं
अमीर बख़्श साबरी
ग़ज़ल
आरज़ू भी दिल में तर्क-ए-आरज़ू भी दिल में हैआदमी की जान मुश्किल क्या बड़ी मुश्किल में है
