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ग़ज़ल
ग़म को दुश्मन दर्द को ना-मेहरबाँ समझा था मैंहाय कुन उठती बहारों को ख़िज़ाँ समझा था मैं
बहज़ाद लखनवी
कलाम
आक़िल रेवाड़वी
कलाम
ऐ जान ग़म-ए-दुश्मन में शोरीदा-सरी क्यूँ हैहम तो अभी ज़िंदा हैं ये जामा-दरी क्यूँ है
मुज़तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
मोहब्बत से न देखो तुम तो दुश्मन की नज़र देखोख़फ़ा होकर बिगड़ कर रूठ कर देखो मगर देखो
सफ़ी औरंगाबादी
क़िता'
शैतान-ओ-नफ़्स दोनों दुश्मन तिरे मगरदुश्मन वो दूर का है ये दुश्मन क़रीब का