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ना'त-ओ-मनक़बत
शाहिद-ए-हक़ आ’रिफ़-ए-फ़ख़्र-ए-ज़मन की बज़्म हैहोशियार ऐ नुत्क़ ये 'ख़्वाजा-हसन' की बज़्म है
अज़ीज़ वारसी देहलवी
कलाम
न होगी रज़्म अगर तो बज़्म वज्ह-ए-बरहमी होगीकिसी सूरत से हो दुनिया तो इक दिन ख़त्म ही होगी
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
पस-ए-पर्दा तुझे हर बज़्म में शामिल समझते हैंकोई महफ़िल हो हम उस को तिरी महफ़िल समझते हैं
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
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कलाम
इम्दाद अ'ली उ'ल्वी
कलाम
अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भीरात के आख़िर होते होते ख़त्म था ये अफ़्साना भी
आरज़ू लखनवी
ना'त-ओ-मनक़बत
सुख़नवर है वही जो बज़्म में है मद्ह-ख़्वाँ तेरावही अहल-ए-ज़बाँ है नाम ले जिस की ज़बाँ तेरा
आशिक़ अली नातिक़
ग़ज़ल
अख़्तर महमूद वारसी
शे'र
सय्यदा ख़ैराबादी
कलाम
उस बज़्म का था तुर्फ़ा-ए-'आलम हर काम ज़माना भूल गयावो होश में लाना भूल गए मैं होश में आना भूल गया