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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
शुद नूर-ए-ख़ुदा जल्वः-गरज़ शान-ए-मोहम्मदआईनः-ए-हक़ या रुख़-ए-ताबान-ए-मोहम्मद
सलामतुल्लाह कश्फ़ी
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रूबाई
मैं तो सनम-परस्त हूँ मुझ को हरम से क्या ग़रज़तेरा करम नसीब हो बाग़-ए-इरम से क्या ग़रज़
फ़ना बुलंदशहरी
पद
अपनी विरह-कथा - सावन मास मेघ घिर आये गरज-गरज धुन शब्द सुनाये
सावन मास मेघ घिर आये गरज-गरज धुन शब्द सुनायेरिम-झिम बरपा होवत भारी हिय बिच लागी बिरह कटारी
शालीग्राम
ग़ज़ल
बेदम शाह वारसी
बैत
सारी दुनिया कह भी दे अपना तो मुझ को क्या ग़रज़
सारी दुनिया कह भी दे अपना तो मुझ को क्या ग़रज़मुझ को मतलब इस से है बस तू कहे अपना मुझे
मोहम्मद समी
शे'र
वली वारसी
कलाम
न हदीस मय की तलाश है न ग़रज़ हिकायत-ए-जाम सेतेरी इक नज़र ने बचा लिया मुझे गुमरही के मक़ाम से
मख़मूर देहलवी
पद
ब्रजभाव के पद - अपनी गरज हो मिटी साँवरे हम देखी तुमरी प्रीत
अपनी गरज हो मिटी साँवरे हम देखी तुमरी प्रीतआपाँ तो जाय द्वारका छाए ऐसे बेहद भए हो नचंत
मीराबाई
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
हेच दानी चे अज़ीँ जल्व: गरी बुवद ग़रज़ख़ुद नुमाई ब-लिबास-ए-बशरी बुवद ग़रज़
वालेह दाग़िस्तानी
कलाम
हम नहीफ़ों से गुरेज़ आप को दरकार नहींपहलू-ए-गुल में हुआ करते हैं क्या ख़ार नहीं