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शे'र
मिस्ल-ए-गुल बाहर गया गुलशन से जब वो गुल-एज़ारअश्क-ए-ख़ूनी से मेरा तन तर-ब-तर होने लगा
किशन सिंह आरिफ़
शे'र
मिस्ल-ए-गुल बाहर गया गुलशन से जब वो गुल-ए'ज़ारअश्क-ए-ख़ूनी से मेरा तन तर-ब-तर होने लगा
किशन सिंह आरिफ़
क़िस्सा
क़िस्सा चहार दर्वेश
यह कह कर मैं यहूदी के नज़दीक गया और कहा, ‘आज जुमाअ’ का दिन है। तू
अमीर ख़ुसरौ
कलाम
अंदर हू ते बाहर हौ हू बाहर कत्थे जलेंदा हूहू दा दाग़ मोहब्बत वाला हर-दम नाल सड़ेंदा हू
सुल्तान बाहू
दोहरा
अरी हंसरी बूझ बाहर समुँद सँभाल
अरी हंसरी बूझ बाहर समुँद सँभालइस तालरि बेरी घने मत कोइ मेलै जाल
अब्दुल क़ुद्दूस गंगोही
ग़ज़ल
कहा जब मैं तेरा बोसा तो जैसे क़ंद है प्यारेलगा तब कहने पर क़ंद-ए-मुकर्रर हो नहीं सकता
ख़्वाजा मीर दर्द
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
दर चश्म-ए-'हज़ीँ' दानम बे-पर्दः तुई पैदाऐ चश्म-ओ-चराग़-ए-दिल परवानः तुरा याबम
हज़ीं ज़ैदपुरी
दोहरा
जैसो लहर समुद्र की बाहर निकरी माय
जैसो लहर समुद्र की बाहर निकरी मायसदा आन्ह समुंद वो समुँदहि पैठी जाय