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ग़ज़ल
ज़मीन-ए-मय-कदः अर्श-ए-बरीं मा’लूम होती हैये ख़िश्त-ए-ख़ुम फ़रिश्ते की जबीं मा’लूम होती है
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
नज़र वाले शरीक-ए-जल्वा-गाह-ए-तूर होते हैंकि हर महफ़िल के दुनिया में अलग दस्तूर होते हैं
नख़शब जारचवी
शे'र
जो दिल हो जल्वा-गाह-ए-नाज़ इस में ग़म नहीं होताजहाँ सरकार होते हैं वहाँ मातम नहीं होता
कामिल शत्तारी
शे'र
जो दिल हो जल्वा-गाह-ए-नाज़ इस में ग़म नहीं होताजहाँ सरकार होते हैं वहाँ मातम नहीं होता
कामिल शत्तारी
ग़ज़ल
जो दिल हो जल्वः-गाह-ए-नाज़ इस में ग़म नहीं होताजहाँ सरकार होते हैं वहाँ मातम नहीं होता
कामिल शत्तारी
शे'र
बहुत ही ख़ैर गुज़री होते होते रह गई उस सेजिसे में ग़ैर समझा हूँ वो उन का पासबाँ होगा
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
फ़ुज़ूँ होता है या कम-इज़्तिराब-ए-दिल ख़ुदा जानेनिगाहें हाल पर रहती हैं मुस्तक़बिल ख़ुदा जाने
ग़ुबार भट्टी
ग़ज़ल
और ज़िक्र-ए-’ऐश से होता है दूना रंज-ओ-ग़मअब कि अगली सोहबतें ख़्वाब-ए-परेशाँ हो गईं