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शे'र
बुलबुल सिफ़त ऐ गुल-बदन इस बाग़ में हर सुब्हतेरी बहारिस्तान का दीवाना हूँ दीवाना हूँ
क़ादिर बख़्श बेदिल
दोहा
होत कृपा जो बडेन की सो कदाचि घटि जाय
होत कृपा जो बडेन की सो कदाचि घटि जायतौ 'रहीम' मरिबो भलो ये दुख सहो न जाय
रहीम
बैत
सरशार मय-ए-इ'श्क़ से है मेरा बदन
सरशार मय-ए-इ'श्क़ से है मेरा बदनमेरी रगों में तो अब वही दौड़ती है
सय्यद फ़ैज़ान वारसी
दोहा
रहिमन माँगत बडेन की लघुता होत अनूप
रहिमन माँगत बडेन की लघुता होत अनूपबलि मख माँगन को गए धरि बावन को रूप
रहीम
शे'र
ऐ 'तुराब' जब गुल-बदन के दर्द सूँ गिर्यां कियादामन-ए-गुल पर मिरा हर अश्क दुर्दाना हुआ
तुराब अली दकनी
दोहा
रहिमन देखि बडेन को लघु न दीजिए डारी
रहिमन देखि बडेन को लघु न दीजिए डारीजहाँ काम आवे सुई कहा करे तलवारि
रहीम
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
शगुफ़्त आयद मुरा बर दिल अज़ीं ज़िंदान-ए-सुल्तानीकि दर ज़िंदान-ए-सुल्तानी मनम सुल्तान-ए-ज़िंदानी
हकीम सनाई
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
नसीम-ए-सुब्ह-ए-सआ'दत बदाँ निशाँ कि तू दानीख़बर ब-कू-ए-फ़ुलाँ बर बदाँ ज़बाँ कि तू दानी
हाफ़िज़
दोहा
रहिमन दुरदिन के परे बड़ेन किए घटि काज
रहिमन दुरदिन के परे बड़ेन किए घटि काजपाँच रूप पांडव भए रथवाहक नलराज